कैसे बनेंगे बच्चे स्मार्ट: वाराणसी में स्कूलों की हालत बेहाल, बच्चों के पैरों में जूते नहीं, बोरे को बनाया बस्ता
बच्चों को टाटपट्टी पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। स्मार्ट सिटी के परिषदीय स्कूलों का हाल बेहाल हो गया। शिक्षा पर करोड़ों खर्च करने के बावजूद व्यवस्था चरमराई दिखाई दे रही है।
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न पीठ पर बस्ता, न पैरों में जूते। न यूनिफॉर्म और न ही किताब। बेंच तो दूर की कौड़ी टाट पट्टी पर लिखी जा रही भविष्य की पटकथा। ये तस्वीरें किसी दूरदराज गांव या बस्ती की नहीं, बल्कि स्मार्ट सिटी और प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के परिषद स्कूलों की है। विश्व के सबसे पुराने शहरों में शुमार काशी पर अंतरराष्ट्रीय जगत की भी नजर रहती है। आए दिन कोई न कोई विकास कार्यों की खबर मिल ही जाती है।
करोड़ों का बजट तो शिक्षा पर खर्च किया जाता है। मगर अफसरों की सुस्ती और लापरवाही से इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को न तो ड्रेस मिल रहीं न किताबें। बावजूद इन बच्चों का जुनून देखिए इन्हें फर्क नहीं पड़ता पैरों में जूते हैं या नहीं, पीठ पर बस्ता है या नहीं इन्हें तो बस पढ़ना है। इन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। बैग फट गया तो पीएम की तस्वीर वाले थैले को ही बस्ता बना लिया। बिना चप्पल स्कूल चले आए। ताकि कल किसी मुकाम पर पहुंच कर देश, प्रदेश और अपनी काशी का नाम रोशन कर सकें। शिक्षक भी मजबूर हैं वह भी पुरानी किताबों से ही बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
प्राथमिक विद्यालय रोहनिया
प्राथमिक विद्यालय रोहनिया में 107 बच्चों का नामांकन है। मंगलवार को मात्र 75 बच्चे ही उपस्थित थे। इस सत्र में अब तक 30 बच्चों ने यहां प्रवेश लिया है। इन बच्चों में किसी के पास भी बैग नहीं था। जिनके पास था वह फटा-पुराना था। कई बच्चे पुराने बैग को सिलकर काम चला रहे हैं। यहीं नहीं कुछ बच्चे अपनी किताबें प्लास्टिक के थैले और पॉलीथिन में भरकर आए थे। विद्यालय के कमरों में बच्चों को बैठने के लिए डेस्क और बेंच दूर की बात, गंदी और टूटी हुई टाट पट्टी और दरी बिछी हुई थी। स्कूल में गिने-चुने बच्चों ने ही यूनिफार्म पहना था, जिसमें किसी का शर्ट फटा था तो किसी की पैंट और स्कर्ट। कोई चप्पल में ही स्कूल आया तो कोई बिना मोजे ही जूता पहन रखा था।
प्राथमिक विद्यालय नरउर
कहने को तो इस विद्यालय के बच्चों के साथ प्रधानमंत्री अपना जन्मदिन मना चुके हैं, लेकिन आज प्राथमिक विद्यालय नरउर में पढ़ने वाले बच्चे सुविधाओं के अभाव में पढ़ाई कर रहे हैं। नामांकित 120 बच्चों में मंगलवार को 80 बच्चे स्कूल आए थे। कक्षा दो के कमरे में बच्चों के लिए डेस्क-बेंच तो थे, लेकिन कक्षा एक के बच्चे दरी और टाट पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। विद्यालय के ज्यादातर बच्चे बिना यूनिफार्म और बैग के ही स्कूल आए थे। विद्यालयों की साफ-सफाई के लिए पिछले चार महीने से ग्राम सभा में कोई सफाई कर्मी नहीं है।
प्राथमिक विद्यालय मंडुवाडीह
प्राथमिक विद्यालय मंडुवाडीह के 220 नामांकित बच्चों में 148 स्कूल आए थे। जबकि 50 बच्चे अब तक इस सत्र में प्रवेश करा चुके हैं। विद्यालय में बच्चों के बैठने के लिए डेस्क-बेंच तो लगे थे। लेकिन आधे बच्चे यूनिफार्म तो आधे घर के कपड़ों में ही विद्यालय पढ़ने आ गए थे। कक्षा एक में छह बच्चे आए तो थे, लेकिन किसी के पास न तो बैग था, न जूता मोजा और न ही यूनिफार्म।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी राकेश सिंह बताया कि शासन की ओर से ड्रेस और जूते और मोजे के लिए कोई दिशानिर्देश नहीं आए हैं। किताबों की खरीदारी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जल्द ही प्राथमिक विद्यालयों की सभी पुस्तकें उपलब्ध करा दी जाएंगी।