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प्रवासी भारतीय सम्मेलनः फिर चमकी काशी की कला और हस्तशिल्प
Tue, 22 Jan 2019 08:10 AM IST
shashikant misra
जयेंद्र चतुर्वेदी,अमर उजाला,वाराणसी
जयेंद्र चतुर्वेदी,अमर उजाला,वाराणसी
Published by: shashikant misra
Updated Tue, 22 Jan 2019 08:10 AM IST
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अंगवस्त्रम् और कलश
- फोटो : amar ujala
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प्रवासी भारतीय सम्मेलन में आए मेहमानों में काशी आतिथ्य के साथ-साथ औद्योगिक-व्यापारिक चर्चा में काशी का हस्तशिल्प और कला छा गई है। प्रवासियों को दिए जा रहे उपहार आदि से हस्तनिर्मित उत्पादों की ब्रांडिंग हो रही है।
इस प्रचार से काशी के साथ पूर्वांचल के प्रसिद्ध और समृद्ध हस्तशिल्प व्यापार के विस्तार की संभावनाएं दिखने लगी हैं। प्रवासी उद्यमियों के साथ बैठकों में यहां के शिल्प एवं कला को विभिन्न देशों में बाजार उपलब्ध कराने पर विचार-विमर्श से स्थानीय व्यापारियों और उद्यमियों की उम्मीदों को पंख लग गए हैं।
चंद साल पहले ही काशी की जिस बुनकरी और शिल्प के भविष्य पर चिंता ही जताई जा रही थी, उसको पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे प्रयासों को इस आयोजन से संजीवनी मिलने की उम्मीद है।
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पीओसीसीआई, एफआईआई जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से हुई चर्चाओं में भी कला, शिल्प और यहां के पर्यटन को केंद्र में रखकर ही मंथन हुआ है। प्रवासी भारतीयों को ‘वेलकम’ के दौरान दिए जा रहे अंगवस्त्रम् बनारस के बुनकरों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग मंचों पर विशिष्टजनों को सम्मानित करने के लिए जरदोजी को फ्रेम कराकर या बुनकरी से तैयार एंबलम दिए जा रहे हैं।
यही नहीं, प्रवासियों को दिया गया कलश और उस पर सम्मेलन के लोगो के साथ बना स्मृति चिह्न भी यहीं के बुनकरों ने बनाया है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ और भारतीय मूल के विदेशी सांसदों को भी काशी के जीआई उत्पादों वाले स्मृति चिह्न से सम्मानित किया जा रहा है।
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इस प्रचार से काशी के साथ पूर्वांचल के प्रसिद्ध और समृद्ध हस्तशिल्प व्यापार के विस्तार की संभावनाएं दिखने लगी हैं। प्रवासी उद्यमियों के साथ बैठकों में यहां के शिल्प एवं कला को विभिन्न देशों में बाजार उपलब्ध कराने पर विचार-विमर्श से स्थानीय व्यापारियों और उद्यमियों की उम्मीदों को पंख लग गए हैं।
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चंद साल पहले ही काशी की जिस बुनकरी और शिल्प के भविष्य पर चिंता ही जताई जा रही थी, उसको पहचान दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए जा रहे प्रयासों को इस आयोजन से संजीवनी मिलने की उम्मीद है।
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पीओसीसीआई, एफआईआई जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से हुई चर्चाओं में भी कला, शिल्प और यहां के पर्यटन को केंद्र में रखकर ही मंथन हुआ है। प्रवासी भारतीयों को ‘वेलकम’ के दौरान दिए जा रहे अंगवस्त्रम् बनारस के बुनकरों द्वारा बनाए गए हैं। अलग-अलग मंचों पर विशिष्टजनों को सम्मानित करने के लिए जरदोजी को फ्रेम कराकर या बुनकरी से तैयार एंबलम दिए जा रहे हैं।
यही नहीं, प्रवासियों को दिया गया कलश और उस पर सम्मेलन के लोगो के साथ बना स्मृति चिह्न भी यहीं के बुनकरों ने बनाया है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जुगनाथ और भारतीय मूल के विदेशी सांसदों को भी काशी के जीआई उत्पादों वाले स्मृति चिह्न से सम्मानित किया जा रहा है।
इनका कहना है
कनाडा की वन मार्केट पैलेस के निदेशक संजीव मलिक का कहना है कि विदेश में हस्तनिर्मित उत्पादों को खासा पसंद किया जाता है। काशी का शिल्प आकर्षक है। इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी। कनाडा के अलावा अन्य मुल्कों में बाजार उपलब्ध कराने का प्रयास होगा।
जीआई विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत का कहना है कि ‘प्रवासी मेहमानों की आवभगत से लेकर उनके सम्मान, मनोरंजन हर जगह काशी की कला व संस्कृति को प्रदर्शित किया गया है। यह शिल्प और कला के साथ-साथ बुनकरों के भविष्य को सुनहरा बनाएगा।
जीआई विशेषज्ञ डॉ. रजनीकांत का कहना है कि ‘प्रवासी मेहमानों की आवभगत से लेकर उनके सम्मान, मनोरंजन हर जगह काशी की कला व संस्कृति को प्रदर्शित किया गया है। यह शिल्प और कला के साथ-साथ बुनकरों के भविष्य को सुनहरा बनाएगा।