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UP: पहली बार पूर्वांचल की 13 में से 12 सीटों पर EVM में नहीं होगा 'पंजा', कभी यह था कांग्रेस का मजबूत गढ़
Sun, 21 Apr 2024 03:13 PM IST
शाहरुख खान
मनीष जायसवाल, अमर उजाला, सोनभद्र
मनीष जायसवाल, अमर उजाला, सोनभद्र
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 21 Apr 2024 03:13 PM IST
सार
पहली बार पूर्वांचल की 13 में से 12 सीटों पर ईवीएम में पंजा नहीं दिखाई देगा। कभी पूर्वांचल कांग्रेस का गढ़ रहा था। कमलापति, टीएन सिंह, मोहसिना सरीखे दिग्गज यहां से सांसद रहे हैं। चुनाव मैदान में कहीं सपा तो कहीं तृणमूल कांग्रेस के लिए कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता वोट मांगते दिखेंगे।
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UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश की सबसे पुरानी पार्टी। पूर्वांचल उसका मजबूत गढ़। फिर भी इस गढ़ के 13 में से 12 सीटों पर इस बार कांग्रेस का कोई भी उम्मीदवार नहीं है। लोकसभा चुनाव के इतिहास में यह पहला मौका है, जब इन सीटों पर ईवीएम में कांग्रेस पार्टी का चुनाव निशान हाथ का पंजा नहीं होगा।
कांग्रेस ने वाराणसी छोड़ अन्य सभी सीटों पर इंडी गठबंधन के अन्य सहयोगियों को समर्थन दिया है। वह प्रत्यक्ष रूप से चुनाव मैदान में नहीं होगी, लेकिन पार्टी के नेता-कार्यकर्ता गठबंधन के सहयोगियों के लिए जरूर वोट मांगते नजर आएंगे।
पूर्वांचल में वाराणसी और आसपास के तीन मंडलों में कुल 13 लोकसभा सीटें हैं। इनमें से ज्यादातर वह लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां वर्षों तक कांग्रेस का एकतरफा वर्चस्व रहा है। पंडित कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, विश्वनाथ गहमरी, श्यामलाल यादव, जैनुल बशर, मोहसिना किदवई, कल्पनाथ राय, रामप्यारे पनिका सरीखे सांसद इस क्षेत्र ने कांग्रेस को दिए हैं।
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कई सीटों पर हैट्रिक के साथ कांग्रेस उम्मीदवारों ने लगातार चार-पांच जीत भी हासिल की है। परिणाम चाहे जो भी रहा हो, कांग्रेस हर चुनाव में कोई न कोई प्रत्याशी जरूर उतारती रही है।
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कांग्रेस ने वाराणसी छोड़ अन्य सभी सीटों पर इंडी गठबंधन के अन्य सहयोगियों को समर्थन दिया है। वह प्रत्यक्ष रूप से चुनाव मैदान में नहीं होगी, लेकिन पार्टी के नेता-कार्यकर्ता गठबंधन के सहयोगियों के लिए जरूर वोट मांगते नजर आएंगे।
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पूर्वांचल में वाराणसी और आसपास के तीन मंडलों में कुल 13 लोकसभा सीटें हैं। इनमें से ज्यादातर वह लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां वर्षों तक कांग्रेस का एकतरफा वर्चस्व रहा है। पंडित कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, विश्वनाथ गहमरी, श्यामलाल यादव, जैनुल बशर, मोहसिना किदवई, कल्पनाथ राय, रामप्यारे पनिका सरीखे सांसद इस क्षेत्र ने कांग्रेस को दिए हैं।
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कई सीटों पर हैट्रिक के साथ कांग्रेस उम्मीदवारों ने लगातार चार-पांच जीत भी हासिल की है। परिणाम चाहे जो भी रहा हो, कांग्रेस हर चुनाव में कोई न कोई प्रत्याशी जरूर उतारती रही है।
इससे इतर इस बार पूर्वांचल की 13 में से 12 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार ही नहीं हैं। सपा सहित अन्य दलों से हुए गठबंधन के तहत कांग्रेस को पूरे यूपी में सिर्फ 17 सीटें मिली हैं। इसमें पूर्वांचल से सिर्फ वाराणसी लोकसभा सीट है। यहां से भाजपा प्रत्याशी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ खुद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय चुनाव मैदान में हैं।
इसके अलावा चंदौली, रॉबर्ट्सगंज, जौनपुर, गाजीपुर, घोसी, बलिया, मछलीशहर, सलेमपुर, लालगंज, भदोही, मिर्जापुर, आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस ने सपा या अन्य सहयोगी दलाें को समर्थन दिया है। लिहाजा इन सीटों पर कांग्रेस कोई प्रत्याशी नहीं उतारेगी। जानकारों की मानें तो लोकसभा चुनाव में यह पहला मौका है, जब कांग्रेस सीधे मैदान में नहीं है।
वर्ष 2017 के विस चुनाव में भी था गठबंधन
इससे पहले वर्ष 2017 में हुए यूपी के विधानसभा चुनाव में भी सपा और कांग्रेस में गठबंधन हुआ था। दोनों दल मिलकर चुनाव लड़े थे। इस गठबंधन में कांग्रेस ने 105 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जबकि 298 सीटों पर सपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार किया था। तब कांग्रेस सात सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। वहीं सपा को 47 सीटें मिली थीं। इस गठबंधन को कुल 28 प्रतिशत वोट मिले थे। इसमें सपा को 21.8, जबकि कांग्रेस को 6.2 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था।
इससे पहले वर्ष 2017 में हुए यूपी के विधानसभा चुनाव में भी सपा और कांग्रेस में गठबंधन हुआ था। दोनों दल मिलकर चुनाव लड़े थे। इस गठबंधन में कांग्रेस ने 105 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जबकि 298 सीटों पर सपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार किया था। तब कांग्रेस सात सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। वहीं सपा को 47 सीटें मिली थीं। इस गठबंधन को कुल 28 प्रतिशत वोट मिले थे। इसमें सपा को 21.8, जबकि कांग्रेस को 6.2 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था।
1977 के बाद बदला था कांग्रेस का चुनाव निशान
वर्ष 1977 से पहले कांग्रेस का चुनाव निशान गाय-बछड़ा था। 1978 में कांग्रेस का एक बार फिर दो हिस्सों में बंट गई। इसके बाद चुनाव आयोग ने गाय-बछड़ा चुनाव चिह्न जब्त कर लिया था। इंदिरा गांधी को नया निशान लेना पड़ा था। पंजा, साइकिल और हाथी का प्रस्ताव दिया गया था। इंदिरा गांधी ने पंजा को चुना था। इसके बाद से लोकसभा के हर चुनाव में यह निशान मतपत्र और ईवीएम में रहा है। खांटी कांग्रेसी प्रत्याशी को जाने, समझे बगैर सिर्फ यह निशान देखकर ही वोट देते रहे, मगर इस बार उन्हें यह चुनाव निशान नहीं दिखेगा।
वर्ष 1977 से पहले कांग्रेस का चुनाव निशान गाय-बछड़ा था। 1978 में कांग्रेस का एक बार फिर दो हिस्सों में बंट गई। इसके बाद चुनाव आयोग ने गाय-बछड़ा चुनाव चिह्न जब्त कर लिया था। इंदिरा गांधी को नया निशान लेना पड़ा था। पंजा, साइकिल और हाथी का प्रस्ताव दिया गया था। इंदिरा गांधी ने पंजा को चुना था। इसके बाद से लोकसभा के हर चुनाव में यह निशान मतपत्र और ईवीएम में रहा है। खांटी कांग्रेसी प्रत्याशी को जाने, समझे बगैर सिर्फ यह निशान देखकर ही वोट देते रहे, मगर इस बार उन्हें यह चुनाव निशान नहीं दिखेगा।