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चोरी हो गई उद्धवशतक की रचना तो दोबारा लिख डाला

Tue, 22 Jun 2021 01:12 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 22 Jun 2021 01:12 AM IST
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Uddhavshatak's composition was stolen, then rewritten
जगन्नाथ दास रत्नाकर का ब्रजभाषा पर अद्भुत अधिकार था और उनकी प्रसिद्ध ब्रजभाषा रचनाओं में सुंदर प्रयोगों एवं ठेठ शब्दावली का प्रयोग हुआ है। काशी में जन्मे रत्नाकर जी स्वच्छ कल्पना के कवि हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत दृश्यावली सदैव अनुभूति और संवेदना को जाग्रत करनेवाली है। आज उनकी पुण्यतिथि मनाई जाएगी।
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सीएम एंग्लो बंगाली टोला इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. विश्वनाथ दुबे ने बताया कि रत्नाकर जी केवल कवि ही नहीं थे, वरन वे अनेक भाषाओं (संस्कृत, प्राकृत, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी) के ज्ञाता तथा विद्वान भी थे। उनकी कविप्रतिभा जैसी आश्चर्यकारी थी, वैसी ही किसी छंद की व्याख्या करने की क्षमता भी विलक्षण थी। अनेक विद्वानों ने रत्नाकर जी की टीकाओं की प्रशंसा की है। अंतिम समय तक इनका संबंध अयोध्या दरबार से रहा। इस बीच इन्होंने बिहारी रत्नाकर नाम से बिहारी सतसई का संपादन किया।
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14 मई सन 1921 ई. से अयोध्या की महारानी की प्रेरणा से इन्होंने गंगावतरण काव्य की रचना प्रारंभ की, जो सन 1923 में समाप्त हुई। इसी समय उद्धवशतक का भी रचनाकार्य चलता रहा। हरिद्वार यात्रा में एक बार इनकी पेटी खो गई जिससे उद्धव शतक के सौ सवा सौ छंद चोरी चले गए। पर रत्नाकर जी ने अपनी स्मृति से उन्हें फिर लिख डाला। उद्धव शतक इनकी सर्वोत्कृष्ट रचना है। ये सन 1926 में ओरियंटल कांफ्रेंस के हिंदी विभाग के सभापति हुए और सन 1930 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के 20वें अधिवेशन के सभापति चुने गए। इस अधिवेशन का सभापतित्व इन्होंने राजसी ठाटबाट के साथ किया। सन 1932 ई. में 22 जून को इनका अचानक स्वर्गवास हो गया।
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