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उड़त गुलाल लाल भईं गलियां...
वाराण्ासी, ब्यूरो
Updated Mon, 02 Mar 2015 01:33 AM IST
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वाराणसी। उड़त गुलाल लाल भईं गलियां चितवत चंद्र चकोरी...। रविवार की शाम काशी के सबसे बड़े रंगोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी पर देवाधिदेव बाबा विश्वनाथ के दरबार की शोभा इसी अंदाज में निखरी। सांझ ढलने से पहले ही महंत के घर से बाबा चांदी की पालकी पर गौरा को विदा कराकर निकले और गली से गर्भगृह तक का कोना-कोना रंगों की लाली से पट गया।
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शहनाई की मंगलध्वनि के बीच छतों-बारजों से गुलाब की पंखुडि़यों की वर्षा और आसमान में उड़ते अबीर-गुलाल के उस अनूठे मौके का साक्षी देश ही नहीं, दुनिया के कई हिस्सों से आए विदेशी मेहमान भी बने। पीएम नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के नारे को कामयाब बनाने के लिए डोली निकलने से पहले गलियों में तीर्थ पुरोहितों ने झाड़ू भी लगाई।
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गौरा के गौने की बारात रंगों की विविधता के लिए यादगार बन गई। शाम 5:30 बजे महंत डॉ. कुलपति तिवारी के आवास पर रजत चल प्रतिमाओं वाले भगवान शिव, माता पार्वती और गोद में भगवान गणेश की महाआरती हुई। इसी के साथ महंत के घर से गौरा की सुसज्जित पालकी उठाई गई।
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पहली मंजिल से पालकी उठते ही शंख ध्वनि गूंजने लगी। डमरू नाद होने लगा। डमरु-त्रिशूलधारी भक्त झूम-नाचकर उस घड़ी को और यादगार बना रहे थे। आंगन में धक्के खाती ठसाठस भीड़ में अबीर-गुलाल से लोगों के चेहरे इस कदर रंग गए कि उनको करीब से भी पहचानना मुश्किल हो गया था।
गली से गौना की पालकी जब गुजरी तब हर तरफ हर हर महादेव के गगनभेदी जयकारे गूंजने लगे। गर्भगृह में अर्चकों, भक्तों ने मुट्ठियों से भर-भर कर एक-दूसरे पर गुलाल की बौछार की। इससे मंदिर का हर कोना जमीन से आसमान तक लाल नजर आने लगा। गर्भगृह में शिव परिवार की अनूठी झांकी की झलक पाने के लिए भक्त बेताब थे। रात 11:30 बजे शयन आरती के बाद चल प्रतिमाएं महंत आवास के लिए विदा हो गईं।
वर्ष में सिर्फ एक बार रंगभरी एकादशी को ही महंत के घर से गौरा की विदाई के मौके पर चल प्रतिमाएं पालकी से गर्भगृह में लाई जाती हैं। इससे पहले मां गौरा का शृंगार करने के लिए महंत के घर महिलाओं की कतार लगी रही।