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बलिया के 'बागी बलिया' बनने की कहानी, 14 अगस्त 1942 को ही फहरा दिया था तिरंगा, पढ़ें अंदर की कहानी

Tue, 13 Aug 2019 06:31 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बलिया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बलिया Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Tue, 13 Aug 2019 06:31 PM IST
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tricolor was hoisted on 14 August 1942 in gaghi ballia independence day
तिरंगा - फोटो : अमर उजाला

स्वतंत्रता आंदोलन में 1942 में ही भारत का तिरंगा फहराने वाला बलिया देश का पहला जिला बना था। इसी लिए बलिया को बागी बलिया भी कहा जाता है। इतिहास के झरोखों में बलिया का स्वतंत्रता आंदोलन स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है।

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1942 में स्वतंत्रता आंदोलन में बंबई (मुंबई) में नेताओं की गिरफ्तारी के बाद बलिया में कांग्रेस के नेताओं को पकड़ा गया। इसके संबंध में ब्रिटिश शासन के एमरी ने हाउस ऑफ कामंस में बयान दिया कि कांग्रेस नेता रेल उखाड़ना व थानों पर कब्जा करना चाहते हैं। इसलिए इन लोगों को पकड़ा गया है।
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इसके बाद जिले भर के कांग्रेसियों ने इकट्ठा होकर ब्रिटिश सरकार के इस फैसले का विरोध किया। इन लोगों ने जगह-जगह इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही पूरे जिले में रैली और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था।

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इसी क्रम में 12 अगस्त लालगंज और 13 अगस्त 1942 को दोकटी में एलान हुआ कि 14 अगस्त को बैरिया थाने पर कब्जा किया जाएगा। इस संदर्भ में 14 अगस्त को क्षेत्र नायक के नेतृत्व में बजरंग आश्रम बहुआरा पर 300 लोग इकट्ठा हुए और झंडाभिवादन कर शपथ ली कि हम बैरिया थाने पर कब्जा किए बिना पीछे नहीं हटेंगे।

इसके बाद बहुआरा गांव निवासी भूप नारायण सिंह को इन लोगों ने अपना कमांडर नियुक्त किया और बैरिया की तरफ बढ़ गए। एक खेत मे पहुचकर वहां फिर शपथ दोहराई गई और जो चाहे तो घर जा सकता है की बात कही। परंतु किसी ने घर नहीं लौटने की बात कही।

इसी बीच कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता वहां पहुंचे और थाने पर कब्जा करने और ना करने पर बहस छेड़ दी। इस बहस को छोड़कर बहुआरा गांव निवासी रामजन्म पांडेय ने अगुआई की और वहां से थाने की ओर चल दिए। उनके पीछे पूरा जनमानस उमड़ पड़ा।

थाने पर पहुंचकर कमांडर भूपनारायण सिंह और कुछ उनके साथी अंदर गए और तत्कालीन थानाध्यक्ष काजिम हुसैन के पास पहुंच वहां से जाने को कहा। थानाध्यक्ष काजिम हुसैन ने कहा कि मैंने आप लोगों का अधीनता स्वीकार कर ली है, चाहें तो अपना तिरंगा आप थाने पर लहरा दीजिए। चार दिन का मोहलत दीजिए। मैं और सिपाही अपने परिवार सहित यहां से चले जाएंगे। इस तरह 14 अगस्त 1942 को ही बिना खून-खराबे के बावजूद ही भारतीय तिरंगा बैरिया थाने पर फहरा दिया गया।

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