लड़कियों में खून की कमी दूर करने के लिए वितरित की जाने वाली दवा कूड़े के ढेर में फेंकी मिली
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किशोरी और गर्भवती महिलाओं में रक्त की कमी को दूर करने के लिए आई दवा विकली आयरन एंड फोलिक एसिड सप्लीमेंट (डब्लूआईएफएस) और एंटी बायोटिक इंजेक्शन कूड़े के ढेर मेें मिला। सुईथाकला बीआरसी के सामने खंडहर भवन में बड़ी मात्रा में फेंकी गई इस दवा में तमाम ऐसी हैं, जिनकी मियाद बाकी है। मामला उजागर होने के बाद स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपकर दायित्वों से पल्ला झाड़ने में लगे हैं।
किशोरियों और महिलाओं में रक्त की कमी सामान्य समस्या है। कई बार यह कमी इतनी ज्यादा होती है कि वह एनीमिया की चपेट में आ जाती है। इसका असर उनके स्वास्थ्य के साथ दैनिक कामकाज पर भी पड़ता है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह बेहद घातक होता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत अभियान चलाकर स्कूलों में किशोरी बच्चियों व गर्भवती महिलाओं में डब्लूआईएफएस की गोली वितरित कराया जा रहा है। यह जिम्मेदारी विद्यालय के शिक्षकों, एएनएम व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सौंपी गई है।
जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते सुईथाकला ब्लाक में वितरण की बजाए दवा कूड़े के ढेर में फेंक दिया गया है। बड़ी मात्रा में यह दवा बीआरसी के सामने स्थित खंडहर भवन में शनिवार को पड़ा मिला। इनमें डब्लूआईएफएस जूनियर दवा का निर्माण जून 2018 में हुआ था, जिसका उपयोग मई 2020 तक किया जा सकता है। वहीं डब्लूआईएफएस दवा दिसंबर 2016 की बनी है, जो नवंबर 2018 में ही एक्सपायर हो गई। भारी मात्रा में इंजेक्शन भी पड़े मिले हैं।
समय से वितरण की बजाए कूड़े के ढेर में दवाओं को फेंकने के बाबत जब अमर उजाला ने जिम्मेदारों से सवाल किया तो वह जवाब देने से हिचकने लगे। बीईओ आरएन पाठक का कहना था कि विभाग को जो भी दवा मिली थी, उसका शत-प्रतिशत वितरण कर दिया गया। खंडहर भवन में पहले सीएचसी संचालित था, लिहाजा दवा उन्हीं की हो सकती है। शिक्षा विभाग का इससे कोई लेना-देना नहीं है। उधर, सीएचसी के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ.अंशुमान मिश्र का कहना था कि स्कूलों में दवा वितरण के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को दिया गया था। उन्होंने क्यों नहीं बांटा, जानकारी नहीं है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
इन कक्षाओं में बंटनी थी दवा
डब्लूआईएफएस जूनियर टेबलट कक्षा एक से पांच तक के बच्चों को वितरित किया जाना था। वहीं डब्लूआईएफएस दवा कक्षा-6 से 12 तक की छात्राओं में दिया जाना था। गर्भवती महिलाओं में एंटीबायोटिक इंजेक्शन लगाया जाना था।