एक टिड्डी दल प्रयागराज की ओर मुड़ा, वाराणसी में टिड्डियों के दल से कितना खतरा, पढ़ें खबर
- टिड्डियों का एक छोटा दल फिर प्रयागराज की तरफ, बनारस के लिए कोई खतरा नहीं
- रसायन के छिड़काव से खत्म हो जाएगा दल, थाली और ढोल बजाकर, शोर मचाना और खरपतवार को जलाकर बचा जा सकता है।
- एक दल मऊ में ठहरा और दूसरा मध्य प्रदेश पहुंच गया।
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हवाओं के बदले रुख के बाद शुक्रवार को एक बार फिर टिड्डियों का एक छोटा दल प्रयागराज की तरफ बढ़ने लगा। जो चित्रकूट से उड़ान भरते हुए कौशांबी होते हुए मऊ में पहुंच चुका है। जबकि दूसरा दल मध्यप्रदेश की तरफ चला गया।
वाराणसी मंडल के संयुक्त निदेशक कृषि अखिलेश चंद्र शर्मा ने बताया कि शुक्रवार को एक छोटा टिड्डी दल चित्रकूट और कौशांबी होते हुए प्रयागराज दोबारा पहुंच गया। जो मऊ इलाके में ठहरा हुआ है। मंगलवार को प्रयागराज के हंड़िया में मौजूद टिड्डियों पर रसायन का छिड़काव किया गया। जिसमें से बची हुई टिड्डियां चित्रकूट में जाकर दो हिस्सों में बंट हो गईं।
इसमें एक दल मध्य प्रदेश की तरफ चला गया, जबकि एक छोटा दल प्रयागराज की तरफ आ गया। हालांकि पछुआ हवा होने के कारण बनारस मंडल के किसी भी जिले में आने की संभावना नहीं हैं। यदि रसायन का इस दल पर छिड़काव हो जाएगा तो यह समाप्त हो जाएगा।
वहीं काशी विद्यापीठ विकास खंड के सरहद पर निगरानी बनाए हुए सहायक कृषि रक्षा अधिकारी अवधेश सिंह का कहना है छोटे टिड्डी दल में टिड्डियों की संख्या 50 हजार से एक लाख तक हो सकती। जिनसे बचाव के लिए थाली और ढोल बजाकर शोर मचाना और खरपतवार को जलाकर धुआं करना शामिल है।
नीम की पत्ती, सुरती की गांठ और लहसुन के संयुक्त घोल को उबालकर छिड़काव करने से फसल को बचाया जा सकता है। गोबर के घोल का छिड़काव भी काफी असरदार है।