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कभी ईश्वरगंगी से चलती थी सरकार

Mon, 23 Jan 2017 02:24 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Mon, 23 Jan 2017 02:24 AM IST
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The government was moving ever Ishwargangi
tn singh - फोटो : अमर उजाला
आजादी के तीन दशक बाद तक की राजनीति से अब की राजनीति में बहुत बड़ा फर्क आया है। उस दौर की राजनीति सत्ता के उपभोग की नहीं, बल्कि जनसेवा की थी। अब आलीशान बंगले, लाव -लश्कर, भारी सुरक्षा तामझाम के बिना बड़े नेता चल नहीं पाते। ऐसे में यूपी के सीएम रहे त्रिभुवन नारायण सिंह का सादगी भरा जीवन जानकर किसी भी देशवासी का कलेजा सौ गज चौड़ा हो जाएगा। उनके लिए राजनीति जनता के सुखद भविष्य लिए एक तपस्या सरीखी थी। वह सूबे के इकलौते ऐसे सीएम थे, जिन्होंने शपथ लेने के बाद सीएम बंगले में जाने से इनकार कर दिया था। उनका सीएम दफ्तर ईश्वरगंगी का उनका घर था या फिर माल एवेन्यू का एक साधारण कमरा।
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काशी का ईश्वरगंगी मुहल्ला कभी यूपी की सत्ता का केंद्र रहा, जहां अब टूटी सड़कों पर छितराई गिट्टियों, गड्ढों में लोग ठोकरें खाकर गिर रहे हैं। गोबर से भरी गलियों में फिसल रहे हैं। यहां साढ़े चार दशक पहले प्रदेश के 10वें मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह रहते थे। सीएम पद की शपथ लेने के बाद बिना तामझाम के वह ज्यादातर बनारस ही रहते थे। 

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18 अक्तूबर 1970 से 3 अप्रैल1971 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे टीएन सिंह पहले ऐसे राजनेता थे, जिन्होंने पांच- कालीदास मार्ग वाले सीएम आवास में कभी कदम नहीं रखा। शपथ लेने के बाद सीएम निवास में जाने की बजाए, वह अपने घर चले आए थे। तब अफसरों के बहुत आग्रह के बाद लखनऊ में रहने के लिए माल एवेन्यू में उन्होंने एक साधारण आवास स्वीकार किया था। उनका सीएम दफ्तर माल एवेन्यू के बिना साज-सज्जा वाले कमरे से या फिर ईश्वरगंगी से चलता था। 

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बनारस आने के बाद वह पैदल ही चलते थे। उनकी सबसे बड़ी पुत्री उमा सिंह बताती हैं कि मेरी अक्तूबर, 1957 में जब शादी हुई तब जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद आशीर्वाद समारोह में आए थे। बाबूजी ने घर से पैदल ही निकलकर नाटी इमली के भरत मिलाप मैदान के पास उनकी अगवानी की थी। सीएम पर की शपथ लेने के दौरान मां के साथ मैं भी लखनऊ में मौजूद थी। 


 

 

बाबू जी ने पांच, कालीदास मार्ग जाने से मना कर दिया था। तब मुख्य सचिव और डीजीपी स्तर के अधिकारी हैरान रह गए थे। अफसरों ने बाबूजी से प्रार्थना की थी कि वह अपने बंगले में रहना स्वीकार करें लेकिन उन्हें सरकारी शानो-शौकत वाली सुविधा मंजूर नहीं थी। फिर उनके लिए माल एवेन्यू के एक आवास में टेलीफोन लाइन खींचकर वहां छोटा सा दफ्तर बनाया गया। 

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