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मिट्टी के दीयों का क्रेज बरकरार: मांग बढ़ने से कुम्हारों के घरों में लौटीं खुशियां, बच्चे भी बना रहे दीए
Sat, 22 Oct 2022 01:57 PM IST
किरन रौतेला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: किरन रौतेला
Updated Sat, 22 Oct 2022 01:57 PM IST
सार
कुम्हारों के मुताबिक, इस बार की दीपावली खुशहाली लेकर आई है। पिछले दो वर्षों के मुकाबले इस बार सबसे अधिक दीयों की मांग देखी जा रही है। लोहता के भट्टी, मोढैला, चांदपुर, रोहनियां में दीये और खिलौने बनाने का काम जोरों पर है।
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दीये का क्रेज बरकरार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अग्नि, भूमि, जल, आकाश, वायु इन पांच तत्वों से मिलकर बनता है मिट्टी का दीया जिससे रोशन होती है हमारी दीपावली। वक्त बदला, तकनीक बदली, लेकिन दीये की चमक फीकी नहीं हुई। कुम्हारों के घरों में भी दीपोत्सव की खुशियां लौटने लगी हैं। कोरोना काल में परेशानी हुई, लेकिन इस बार दोगुनी मांग से कुम्हार खुश हैं।
कुम्हारों के मुताबिक, इस बार की दीपावली खुशहाली लेकर आई है। पिछले दो वर्षों के मुकाबले इस बार सबसे अधिक दीयों की मांग देखी जा रही है। लोहता के भट्टी, मोढैला, चांदपुर, रोहनियां में दीये और खिलौने बनाने का काम जोरों पर है। कारीगर अचानक मांग बढ़ने के चलते दिन रात एक कर चाक पर आंखें गड़ाए हैं। बुधराम, सुनील, बाबू प्रजापति, मोनू प्रजापति, अशोक, सीता के बनाए दीयों से दीपोत्सव पर हजारों घर रोशन होंगे।
चांदपुर के कुम्हार बुद्धराम का कहना है कि दीपोत्सव को लेकर बदले माहौल और प्लास्टिक पर पाबंदी से कुम्हारी कला को नया जीवन मिला है। काम बढ़ने से युवाओं का रुझान भी इस ओर देखा जा रहा है। घर के बच्चे भी बड़े, बुजुर्गों के साथ लगे हुए हैं। कुम्हारों का कच्ची माटी से बर्तन बनाना मुश्किल हो रहा है। तालाब खत्म होने से उपयुक्त और पर्याप्त मिट्टी नहीं मिल रही है। कछवां, मिर्जामुराद के तालाबों से माटी लानी पड़ती है। पांच घंटे की कड़ी मेहनत के बाद दीयों व बर्तनों को बनाने वाली मिट्टी पूरी तरह से तैयार होती है।
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कुम्हारों के मुताबिक, इस बार की दीपावली खुशहाली लेकर आई है। पिछले दो वर्षों के मुकाबले इस बार सबसे अधिक दीयों की मांग देखी जा रही है। लोहता के भट्टी, मोढैला, चांदपुर, रोहनियां में दीये और खिलौने बनाने का काम जोरों पर है। कारीगर अचानक मांग बढ़ने के चलते दिन रात एक कर चाक पर आंखें गड़ाए हैं। बुधराम, सुनील, बाबू प्रजापति, मोनू प्रजापति, अशोक, सीता के बनाए दीयों से दीपोत्सव पर हजारों घर रोशन होंगे।
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चांदपुर के कुम्हार बुद्धराम का कहना है कि दीपोत्सव को लेकर बदले माहौल और प्लास्टिक पर पाबंदी से कुम्हारी कला को नया जीवन मिला है। काम बढ़ने से युवाओं का रुझान भी इस ओर देखा जा रहा है। घर के बच्चे भी बड़े, बुजुर्गों के साथ लगे हुए हैं। कुम्हारों का कच्ची माटी से बर्तन बनाना मुश्किल हो रहा है। तालाब खत्म होने से उपयुक्त और पर्याप्त मिट्टी नहीं मिल रही है। कछवां, मिर्जामुराद के तालाबों से माटी लानी पड़ती है। पांच घंटे की कड़ी मेहनत के बाद दीयों व बर्तनों को बनाने वाली मिट्टी पूरी तरह से तैयार होती है।
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इलेक्ट्रिक चाक ने बढ़ाई रफ्तार
मोनू बताते हैं कि बदलते वक्त के साथ तकनीक बदली तो हमारा काम भी थोड़ा आसान हुआ है। सरकार की ओर से मिले इलेक्ट्रिक चाक की मदद से अब एक दिन में चार से पांच गुना ज्यादा दीये तैयार हो जाते हैं। पहले दीपावली के लिए हाथों से दीपक तैयार करने के लिए छह महीने पहले से जुट जाते थे। इलेक्ट्रिक चाक आने के बाद अब दो से ढाई महीने में अच्छी मात्रा में दीये तैयार हो जाते हैं।
मोनू बताते हैं कि बदलते वक्त के साथ तकनीक बदली तो हमारा काम भी थोड़ा आसान हुआ है। सरकार की ओर से मिले इलेक्ट्रिक चाक की मदद से अब एक दिन में चार से पांच गुना ज्यादा दीये तैयार हो जाते हैं। पहले दीपावली के लिए हाथों से दीपक तैयार करने के लिए छह महीने पहले से जुट जाते थे। इलेक्ट्रिक चाक आने के बाद अब दो से ढाई महीने में अच्छी मात्रा में दीये तैयार हो जाते हैं।
लक्ष्मी-गणेश और खिलौनों की मांग बढ़ी
कुम्हारों को एक पल की भी फुर्सत नहीं है। इस बार गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों से लेकर खिलौनों तक की मांग बढ़ी है। गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों के साथ महिलाएं खिलौने तैयार करने में जुटी हैं। खिलौनों का रंगरोगन तेजी से चल रहा है। घरेलू बर्तन, गुल्लक, चकिया, चूल्हा, कार, ग्वालिन सहित खिलौने बन रहे हैं।
कुम्हारों को एक पल की भी फुर्सत नहीं है। इस बार गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों से लेकर खिलौनों तक की मांग बढ़ी है। गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों के साथ महिलाएं खिलौने तैयार करने में जुटी हैं। खिलौनों का रंगरोगन तेजी से चल रहा है। घरेलू बर्तन, गुल्लक, चकिया, चूल्हा, कार, ग्वालिन सहित खिलौने बन रहे हैं।