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असि-गंगा संगम पाट डाला, मेले-तीर्थ मिटाए

Tue, 19 Apr 2016 01:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Tue, 19 Apr 2016 01:42 AM IST
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Sword-text highlights the confluence of the Ganges, the fair-Shrine Selected
1972 में तब ऐसा था असि गंगा संगम का नजारा।
 कभी कल-कल, छल-छल कर गंगा की गोद में किलोल करने वाली असि नदी के संगम स्थल को देखकर आपकी आंखें डबडबा आएंगी। उत्तर में वरुणा-गंगा संगम तो अभी सुरक्षित है लेकिन दक्षिण के प्रधान तीर्थ असि-संगम का वजूद मिटाया जा चुका है।
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इस समय जहां सुबह-ए-बनारस की महफिल लगती है और संस्कृति विभाग यज्ञ, आहुति की संस्कृति से देश-दुनिया के पर्यटकों को परिचित कराने में जुटा है, वहां 1972 के बाद तक असि गंग के तीर... की संत तुलसी की कामना को साकार करने वाले संगम पर मेला लगता था। अब वहां घाट की सीढ़ियां और प्लेटफार्म बन गए हैं। इतना ही नहीं तलहटी कब्जा करने की अंधेरगर्दी में असि तट के 98 तीर्थों को भी मिटाया जा चुका है। न उन प्राचीन मूर्तियों का पता है न देवस्थानों का। 
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वाराणसी के नामकरण से जुड़ी पौराणिक नदी असि तकलीफों की ऐसी बाढ़ से घिर गई है जिसका आर्तनाद सुनकर किसी की भी आंखों में आंसू आ जाएंगे। काशी में अस्सी घाट पर असि-गंगा संगम के प्रमाण मिल गए हैं। ज्यादा नहीं अभी 44 साल पहले ली गई तस्वीर में वहां असि संगम मौजूद था। लोग बताते हैं कि इस संगम तट पर सतुआ संक्रांति के दिन बड़ा मेला भी लगता रहा है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आकर इसी संगम में स्नान करते थे। संगम पाट कर घाट बनाए जाने के बाद यह प्राचीन मेला सिर्फ स्मृतियों में रह गया है। 
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अस्सी घाट से चंद कदम पहले जगन्नाथ मंदिर के पास तक इस नदी की तलहटी अभी भी देखी जा सकती है। कुबेर नाथ सुकुल की काशी के तीर्थों पर लिखी गई किताब ‘वाराणसी वैभव’ में असि तट के 98 तीर्थों का पता चलता है। नदी की तलहटी कब्जा करने में अपराध इस हद तक किया गया कि इन तीर्थों का नामोनिशान तक मिटा दिया गया।


इन सभी तीर्थों में देव मूर्तियां और शिवायतन थे। रामचरित मानस की रचना करने वाले संत तुलसी दास ने इस स्थान को अपनी तपस्थली के लिए यूं नहीं चुना होगा। पुराणों में असि-गंगा संगम को ‘संमेद तीर्थ’ कहा गया है। यानी संसार के सभी तीर्थ इसके षोडशांश के बराबर भी नहीं माने गए हैं। इस संगम में स्नान करने पर सभी तीर्थों का फल मिलता था। 
 
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