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खेल: बीएचयू में खेला गया 1700 साल प्राचीन गुप्तकालीन चतुरंग, गोवा का तुल फाले और मुगलकालीन गंजीफा भी

Fri, 18 Sep 2026 11:54 AM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 18 Sep 2026 11:54 AM IST
सार

बीएचयू में 1700 साल प्राचीन गुप्तकालीन चतुरंग खेला गया। इस दौरान तेलंगाना से आईं छात्राओं ने विभाग में इसका स्टॉल लगाया। वहीं क्रीड़ा कॉन्फ्रेंस में काशी की लकड़ियों वाले पारंपरिक खिलौनों को पहचान दिलाने पर चर्चा हुई।

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Sports news of 1,700-year-old Gupta-era Chaturanga played at BHU Goa Tul Phale and Mughal-era Ganjifa in Kashi
खिलौने देखते कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी - फोटो : बीएचयू

विस्तार

बीएचयू के शारीरिक शिक्षा विभाग में बृहस्पतिवार से शुरू हुई क्रीड़ा कॉन्फ्रेंस में काशी की लकड़ियों के बने पारंपरिक खिलौने सहित दक्षिण भारत के माइंड गेम्स और प्ले कार्ड्स की प्रदर्शनी लगी। 1700 साल पहले गुप्तकाल में खेला जाने वाला चतुरंग खेल हुआ। इसे शतरंज का प्राचीन भारतीय पूर्वज भी कहा जाता है। तेलंगाना से आईं छात्राओं ने विभाग में इसका स्टॉल लगाया। वहीं, गोवा का पारंपरिक खेल तुल फाले और फारसी व मुगल कालीन खेल गंजीफा भी लोगों को खूब पसंद आया।

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कॉन्फ्रेंस में मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि खिलौनों को सिर्फ सामान्य या बच्चों के मनोरंजन की वस्तु के रूप में ही न देखा जाए। यह एक बड़ा बाजार है। इसकी डिजाइन में लोकप्रियता और उपयोग में सरलता भी हो। वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी शब्द आधारित बैठ कर खेले जाने वाले खेलों को बढ़ावा देना चाहिए। 
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कुलपति ने खिलौनों के निर्माण में लकड़ी, प्लास्टिक, एल्युमिनियम और नए इंजीनियरिंग पदार्थों की सामग्रियों पर शोध की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि तकनीक ऐसी हो कि खिलौनों को किफायती और आसानी से तैयार किया जा सके। पारंपरिक लकड़ी के खिलौने बनाने की प्रक्रियाओं में समय लगता है। 
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बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए बेहतर निर्माण और फैब्रिकेशन प्रक्रियाएं विकसित हो रही हैं। कॉन्फ्रेंस में काशी के पारंपरिक खिलौनों को वैश्विक पहचान दिलाने पर चर्चा हुई। तीन दिनों के इस राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन क्रीड़ा डिजाइन एक्टिविटी हैंडबुक का लोकार्पण हुआ। इसके सह-लेखक डॉ. दीपक कुमार डोगरा और धीरज तिवारी हैं।

प्राथमिक शिक्षा में शामिल हो टॉय पेडागॉजी
विशिष्ट अतिथि डॉ. रजनीकांत ने भारत के सामुदायिक ज्ञान, पारंपरिक उत्पादों और शिल्प के संरक्षण और दस्तावेजीकरण का महत्व बताया। संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा में टॉय पेडागॉजी को शामिल किया जाए। आयोजन सचिव प्रो. बीसी कापड़ी ने कहा कि खेलना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। धागे और छोटी गेंद वाले एक खिलौने का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ऐसी गतिविधि बच्चों में आंख और हाथ के बीच समन्वय के साथ निर्णय लेने की क्षमता विकसित करेगी।

खिलौनों पर शॉर्ट टर्म फिल्म भी चली
सम्मेलन की शुरुआत में खिलौनों पर एक शॉर्ट फिल्म भी दिखाई गई। शारीरिक शिक्षा विभाग के अध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह ने स्वागत और आयोजन सचिव डॉ. विनायक कुमार दुबे ने धन्यवाद दिया। क्रीड़ा फॉर रिवाइविंग ट्रेडिशनल गेम्स की अध्यक्ष डॉ. विनीता सिद्धार्थ, टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सलाहकार डॉ. शैलेंद्र जायसवाल, प्रो. शांति स्वरूप सिन्हा और प्रो. मनीष अरोड़ा, डॉ. सचिन तिवारी आदि मौजूद रहे। 
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