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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Special on death anniversary: poet Dhumil dream remains incomplete due to failure, proof of truth found in his poetry 

पुण्यतिथि पर विशेष: मुफलिसी की वजह से अधूरा रह गया कवि धूमिल का सपना, इनकी कविता में मिलता है सच का सबूत

Wed, 10 Feb 2021 11:20 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Wed, 10 Feb 2021 11:20 AM IST
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Special on death anniversary: poet Dhumil dream remains incomplete due to failure, proof of truth found in his poetry 
कवि धूमिल। - फोटो : अमर उजाला

जाने माने कवि सुदामा पांडेय धूमिल एक ऐसे कवि थे, जिनका इंटरमीडिएट करने का सपना मुफलिसी की वजह से अधूरा रह गया। यह तो उनकी प्रतिभा ही थी कि उन्होंने डिप्लोमा किया और फिर अपनी कविताओं के बल पर न केवल अपनी अलग पहचान बनाई बल्कि काशी का मान भी पूरे दुनिया में बढ़ाया।

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आराजी लाइन के खेवली ग्राम में नौ नवंबर 1936 को जन्म के बाद गांव में शुरुआती पढ़ाई के बाद धूमिल ने हरहुआ के काशी इंटर कॉलेज से 1953 में दसवीं की परीक्षा पास की। खास बात यह रही कि पूरे गांव में वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने उस समय दसवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए 11वीं में हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में दाखिला तो लिया लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
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विज्ञान विषय से इंटरमीडिएट करने के लिए कोलकाता जाकर नौकरी भी की, जो कुछ पैसा मिला, उसके बाद यहां आकर डिप्लोमा भी किया। पिता शिवनायक पांडेय, माता रजवंती देवी के साथ ही पत्नी मूरत देवी का भी उन्हें सहयोग मिलता रहा। आईटीआई से विद्युत डिप्लोमा करने के बाद इसी संस्थान में अनुदेशक भी बनकर सेवा दी। वर्ष 1979 में सरकार ने साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा। 10 फरवरी 1975 को उनका निधन ब्रेन ट्यूमर से लखनऊ में हुआ।

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मुख्य रचनाएं-
संसद से सड़क तक
कल सुनना मुझे
धमिल की कविताएं
किस्सा जनतंत्र
मोचीराम 

धूमिल की कविता में मिलता है सच का सबूत
साहित्यिक संस्था चिंतन के फेसबुक पेज पर कवि सुदामा पांडेय धूमिल की पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर आयोजित व्याख्यान में उनकी कविताओं पर प्रकाश डाला गया। बीएचयू हिंदी विभाग के प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि धूमिल की कविताओं में सच का सबूत देखने को मिलता है। कविताओं को उन्होंने बनारस के खेवली में रहकर लिखा। उनकी कविताओं में गांव की मिट्टी के हरियाली का छंद है जहां घास सदियों से अपने रौंदे जाने का इतिहास कहती है।

बसंत व बनारस उनकी कविताओं का प्राण तत्व है। प्रो. शुक्ल ने कविता मोचीराम, पटकथा और सुदामा पांडेय का प्रजातंत्र के बहाने कहा कि हमारे समय की छाई धुंध के भीतर धूमिल शब्द ज्योति की तरह हैं, जिनमें किसान व ग्रामीण जीवन की विविध अभिव्यक्तियां मिलती हैं। धूमिल खेतों की आवाज की पुनर्ववापसी के कवि रहे हैं जो जनता के संघर्ष को स्वर देते हैं। उन्होंने धूमिल को संकट के पहचान के कवि के रूप में याद किया और कहा कि धूमिल हर तरह की फुसफुसाहट के खिलाफ बगावत की आवाज थे।

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