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सोने को लेकर चर्चा में आए सोनभद्र के ऐसे हालातों के बारे जानते हैं आप? हजारों लोग झेल रहे ये दंश

Mon, 24 Feb 2020 04:25 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र
अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Mon, 24 Feb 2020 04:25 PM IST
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Sonbhadra people drinking fluoride mixed water in chopan block duddhi myorpur
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media

उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिले पिछले कुछ दिनों से काफी चर्चाओं में है। हाल ही जिला खनन अधिकारी ने करीब 3000 हजार टन सोना होने की बात कही थी, इसके बाद यह जिला पूरे देश के साथ दुनिया भर में चर्चा में आ गया था। लेकिन शनिवार को भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने इसे खारिज कर दिया था।

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इसके साथ ही सोनभद्र में और भी खनिज संपदा धातु होने की बात चर्चा है। म्योरपुर ब्लॉक के लौबंद ग्राम पंचायत के भुक्कू पहाड़ी पर ग्रेनाइट पत्थर भी मिलने की चर्चा है। कई दशक से जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (जीएसआई) की टीम इलाके में सर्वे का काम कर रही है। साथ ही यूरेनियम, सिलिमेनाइट और संगमरमर पत्थर के उपलब्ध होने की बात सामने आती रही है।
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क्या आप जानते हैं इतना खनिज होने के दावे के लिए सुर्खियां बटोर चुके सोनभद्र में हजारों लोग शुद्ध पेय जल के अभाव में तिल-तिल कर मर रहे हैं। सोनभद्र के चोपन, म्योरुपर, दुद्धी और वभनी ब्लॉक में करीब 50 हजार की आबादी ऐसे ही इलाके में जी रही है, जहां फ्लोराइड पानी पीने को मजबूर है।
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वायु और जल प्रदूषण से 269 गांव के लगभग दस हजार ग्रामीण फ्लोरोसिस बीमारी से ग्रस्त होकर अपंग हो गए हैं। जिले में दस हजार व्यक्ति खराब गुणवत्ता की हवा और फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस नामक बीमारी से ग्रस्त होकर अपंग हो गए हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के हस्तक्षेप के बाद भी राज्य सरकार या जिला प्रशासन कोई कारगर कदम नहीं उठा सका है।

Sonbhadra people drinking fluoride mixed water in chopan block duddhi myorpur
कोन क्षेत्र के रोहिनवा दामर गांव में खराब पड़ा फ्लोराइड रिमूवर प्लांट। - फोटो : अमर उजाला।

चोपन ब्लॉक के ग्राम पंचायत कचनरवा के रोहिनवादामर टोले में आजादी के 72 साल बाद भी पांच सौ की आबादी वाली इस बस्ती को शुद्ध पेयजल मयस्सर नहीं है। मजबूरन ग्रामीणों को फ्लोराइड के अधिकता वाले पानी का सेवन करना पड़ रहा है। इसके चलते यहां के लोग तीन पीढ़ियों से विकलांग होते चले आ रहे हैं। वहीं यहां के लोगों का जीवन भी नरकीय बन गया है।

चोपन ब्लॉक के नेरुइयादामर टोले की बासो देवी(45) को देखकर कोई भी उनकी उम्र का 80-85 वर्ष ही अंदाजा लगाएगा। बासो देवी और उनके पति सरयू के जोड़ों में हर समय दर्द बना रहता है। इनके अलावा सुनैना देवी, पनवा देवी चिरंजीवी शर्मा, कुसुमरी देवी, कु रिकूं पुत्री मुन्नी उरांव जो 19 वर्ष की हैं, वह भी जिंदगी व मौत से जूझ रही हैं।

यहां के लोगों की मानें तो रोहनियादामर के धांगर टोले की नब्बे फीसदी आबादी विकलांगता की शिकार हो चुकी है। पानी में फ्लोराइड के अधिकता के चलते महज तीन से चार वर्ष के उम्र के बच्चों के ही दांत पीले और छींटदार हो जा रहे हैं। वहीं 16-17 वर्ष उम्र होते-होते हड्डियां टेढ़ी होनी शुरू हो जा रही हैं। हालत यह है कि युवावस्था में ही यहां के लोग झुक कर चलने को मजबूर हैं। वहीं तमाम लोग ऐसे हैं जो जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।

राहत के नाम पर यहां बीच-बीच में स्वास्थ्य कैंप लगाए जाते हैं लेकिन उनके यहां से भी फ्लोराइड जनित फ्लोरोसिस रोग की कोई दवा उपलब्ध नहीं हो पाती। सिर्फ लक्षणों के आधार पर ही टेबलेट-कैप्सूल पकड़ा दिया जाता है। कई बार यहां के लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने, बीमारी के स्थाई निदान के सपने दिखाए गए। दो संयंत्र भी लगाए गए लेकिन कुछ साल बाद ही वह खराब होकर बेकार हो गए। तब से अब तक गांव के लोग पुराने हाल में जीवन जीने को विवश हैं।

गांव के चिरंजीवी शर्मा कहते हैं कि साहब हमें शुद्ध पानी नहीं दे सकते तो कहीं और बसा दीजिए, कम से कम हम इस नरकीय जीवन से मुक्त तो हो जाएंगे। शिवधारी चेरो, रामपति, रघुवीर चेरो सहित कई ग्रामीणों का भी यहीं कहना है। उनका कहना था कि गांव में कई लोग चारपाई पर पड़कर जिंदगी-मौत से जूझ रहे हैं लेकिन राहत तो दूर कोई अफसर-जनप्रतिनिधि उनके यहां झांकना भी गवांरा नहीं समझता। इन्होंने ये भी बताया कि इस गांव में हम सभी अपनी लड़कियों को बाल विवाह न चाहते हुए भी करने को मजबूर हैं, क्योंकि की बालिग होते-होते कई बीमारियां जकड़ लेती हैं, और फिर विवाह करना मुश्किल हो जाता है।

2006 से 2008 तक ही मिल पाया शुद्ध पेयजल 
वर्ष 2006 में इस बस्ती में सौर ऊर्जा आधारित फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र की स्थापना उत्तर प्रदेश जल निगम की तरफ से की गई। इससे पानी को शुद्ध कर पूरे गांव में पाइप लाइन से आपूर्ति शुरू की गई। इसके लिए 15 जगहों पर नल लगाए गए लोगों के स्वास्थ्य में सुधार भी दिखा लेकिन महज दो वर्ष बाद 2008 में सोलर पैनल चोरी हो गए और इसके बाद से इसे इसके हाल पर छोड़ दिया गया।

रख-रखाव न होने से फ्लोराइड रिमूवल मशीन भी खराब हो गई। इसी तरह सौर ऊर्जा आधारित एक और मिनी फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र बस्ती के बीच मे लगा था, जिसको सबमर्सिबल पंप से जोड़कर पानी की आपूर्ति दी जाती थी लेकिन सबमरसिबल पंप के खराब होने के साथ यह सुविधा भी खत्म हो गई। तब से अब तक  यहां के लोग फ्लोराइड की अधिकता वाले पानी के सेवन को मजबूर हैं।

सोनभद्र के क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी राधेश्याम ने बताया कि फ्लोराइड प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिए समय-समय पर संबंधितों से पत्राचार किया जाता है। प्रभावित गांवों में पाइपलाइन से पेयजलापूर्ति जल्द शुरू हो, इसके लिए वह अपने स्तर चसे पूरा प्रयास जारी रखे हुए हैं।

सीएमओ सोनभद्र डॉ. शशिकांत उपाध्याय ने बताया कि फ्लोराइड के प्रभाव को रोकने के लिए शुद्ध पेयजल ही एकमात्र विकल्प है। जहां तक स्वास्थ्य महकमे की बात है तो प्रभावित गांवों में कैंप लगाकर पीड़ितों को राहत पहुंचाने का हर संभव प्रयास किया जा रहे हैं।

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