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पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कमलापति त्रिपाठी के पुत्र का निधन, शोक की लहर
टीम डिजिटल,वाराणसी
Updated Wed, 31 Jan 2018 10:53 AM IST
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पंडित मायापति त्रिपाठी
- फोटो : facebook
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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्वर्गीय पंडित कमलापति त्रिपाठी के मंझले पुत्र पंडित मायापति त्रिपाठी का सोमवार की रात निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। पिछले कुछ समय से काफी अस्वस्थ चल रहे थे। औरंगाबाद हाउस स्थित आवास में सोमवार रात करीब पौने 11 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
निधन की खबर फैलते ही कांग्रेस नेताओं और शुभचिंतकों में शोक की लहर दौड़ पड़ी। पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए औरंगाबाद हाउस पर लोगों का तांता लग गया। पंडित मायापति अपने पीछे दो बेटे और एक बेटी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। मंगलवार की सुबह औरंगाबाद हाउस से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली शवयात्रा में कांग्रेस नेताओं, समर्थकों, शुभचिंतकों की भीड़ उमड़ पड़ी।
मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि बड़े बेटे अंबरीष पति त्रिपाठी ने दी। पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी के तीन पुत्रों में सबसे बड़े पंडित लोकपति त्रिपाठी का वर्ष 2005 देहावसान हो चुका है। पंडित मायापति त्रिपाठी दूसरे नंबर पर थे। सबसे छोटे पुत्र पंडित मंगलापति त्रिपाठी हैं।
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पंडित मायापति ने बीएचयू और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की थी। 1972 में अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी की स्थापना की और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। 1974 में गोरखपुर से एमएलसी और 1984 में लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन जीत हासिल नहीं हुई।
इस वाहिनी की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय योगदान के लिए हर वर्ष पंडित कमला पति त्रिपाठी उत्कृष्ट सेवा सम्मान और रत्न श्री सम्मान दिया जाता है।
पंडित मायापति त्रिपाठी के निधन पर कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं, शुभचिंतकों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। पूर्व विधायक अजय राय ने कहा कि पंडित मायापति के निधन से कांग्रेस की अपूरणीय क्षति हुई है। प्रो. सतीश राय ने कहा कि पंडित मायापति राजनीतिक सूझबूझ के धनी थे।
उनसे गूढ़ विषयों पर भी सार्थक मार्गदर्शन मिलता था। पंडित मायापति के भतीजे पूर्व एमएलसी राजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि चाचाजी के निधन से परिवार से शीर्ष संरक्षक का साया उठ गया। वह पार्टी और परिवार के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।
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निधन की खबर फैलते ही कांग्रेस नेताओं और शुभचिंतकों में शोक की लहर दौड़ पड़ी। पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि देने के लिए औरंगाबाद हाउस पर लोगों का तांता लग गया। पंडित मायापति अपने पीछे दो बेटे और एक बेटी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं। मंगलवार की सुबह औरंगाबाद हाउस से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली शवयात्रा में कांग्रेस नेताओं, समर्थकों, शुभचिंतकों की भीड़ उमड़ पड़ी।
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मणिकर्णिका घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। मुखाग्नि बड़े बेटे अंबरीष पति त्रिपाठी ने दी। पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी के तीन पुत्रों में सबसे बड़े पंडित लोकपति त्रिपाठी का वर्ष 2005 देहावसान हो चुका है। पंडित मायापति त्रिपाठी दूसरे नंबर पर थे। सबसे छोटे पुत्र पंडित मंगलापति त्रिपाठी हैं।
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पंडित मायापति ने बीएचयू और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की थी। 1972 में अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी की स्थापना की और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। 1974 में गोरखपुर से एमएलसी और 1984 में लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन जीत हासिल नहीं हुई।
इस वाहिनी की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय योगदान के लिए हर वर्ष पंडित कमला पति त्रिपाठी उत्कृष्ट सेवा सम्मान और रत्न श्री सम्मान दिया जाता है।
पंडित मायापति त्रिपाठी के निधन पर कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं, शुभचिंतकों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। पूर्व विधायक अजय राय ने कहा कि पंडित मायापति के निधन से कांग्रेस की अपूरणीय क्षति हुई है। प्रो. सतीश राय ने कहा कि पंडित मायापति राजनीतिक सूझबूझ के धनी थे।
उनसे गूढ़ विषयों पर भी सार्थक मार्गदर्शन मिलता था। पंडित मायापति के भतीजे पूर्व एमएलसी राजेशपति त्रिपाठी ने कहा कि चाचाजी के निधन से परिवार से शीर्ष संरक्षक का साया उठ गया। वह पार्टी और परिवार के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।
स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे पंडित मायापति
पंडित मायापति त्रिपाठी
- फोटो : facebook
काशी की गौरवशाली विद्वत परंपरा और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित मायापति त्रिपाठी अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे। हर मसले पर खरी बात और नजरिया बिल्कुल स्पष्ट। झुकना स्वभाव में नहीं था और सहमति न होने पर शासन-सत्ता के विरोध से भी कभी हिचके नहीं।
अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी की राजनीतिक विरासत के बावजूद उन्होंने अपना कॅरियर एक बीमा अधिकारी के रूप में शुरू किया। 1960 के बाद राजनीति में सक्रिय हुए। अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया और इस संगठन के जरिए किसानों-मजदूरों की आवाज उठाते रहे। 1984 में लोकसभा चुनाव भी लड़े।
राजनीति के साथ ही कुश्ती और क्रिकेट से उनका खास लगाव था। ‘औरंगाबाद हाउस’ के करीबियों के मुताबिक पंडित मायापति त्रिपाठी शुरू से ही जुझारू प्रवृत्ति के रहे। राजनीतिक जगत के प्रतिष्ठित घराने औरंगाबाद हाउस से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने 1956-57 में हिंदुस्तान जनरल इंश्योरेंस कंपनी में बीमा अधिकारी के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की।
1975 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के पहले डिवीजनल मैनेजर बने। फिर कांग्रेस का काम करते हुए उन्होंने किसान, मजदूर वर्ग को संगठित कर अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया। उस समय वाहिनी में कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद थी। संगठन के जरिए किसानों, मजदूरों के मसले पर उन्होंने मजबूती से आवाज उठाई।
कई बार ऐसे मौके आए जब वह सरकार के खिलाफ किसान-मजदूरों के साथ दृढ़ता से खड़े रहे। हालांकि उनकी राजनीतिक सक्रियता का केंद्र वाराणसी की जगह लखनऊ रहा। वहां अपने पिता पंडित कमलापति त्रिपाठी को आवंटित सरकारी आवास में रहते थे। 1990 में पंडित कमलापति के निधन के बाद आवास खाली कर वह वाराणसी चले आए।
यहां पैतृक आवास औरंगाबाद में रहने लगे और राजनीतिक सक्रियता से भी अपने को विरत कर लिया। उनके बेटे अंबरीष त्रिपाठी ने बताया कि पिताजी का खेल से भी काफी लगाव था।
कुश्ती, बैडमिंटन और कुश्ती के आयोजनों में वह अक्सर जाया करते थे। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करते थे। वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट कमेटी से भी जुड़े रहे। पौत्र पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी ने कहा कि उनका पूरा जीवन किसानों, मजदूरों के हितों के प्रति समर्पित था।
अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी की राजनीतिक विरासत के बावजूद उन्होंने अपना कॅरियर एक बीमा अधिकारी के रूप में शुरू किया। 1960 के बाद राजनीति में सक्रिय हुए। अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया और इस संगठन के जरिए किसानों-मजदूरों की आवाज उठाते रहे। 1984 में लोकसभा चुनाव भी लड़े।
राजनीति के साथ ही कुश्ती और क्रिकेट से उनका खास लगाव था। ‘औरंगाबाद हाउस’ के करीबियों के मुताबिक पंडित मायापति त्रिपाठी शुरू से ही जुझारू प्रवृत्ति के रहे। राजनीतिक जगत के प्रतिष्ठित घराने औरंगाबाद हाउस से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने 1956-57 में हिंदुस्तान जनरल इंश्योरेंस कंपनी में बीमा अधिकारी के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की।
1975 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के पहले डिवीजनल मैनेजर बने। फिर कांग्रेस का काम करते हुए उन्होंने किसान, मजदूर वर्ग को संगठित कर अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया। उस समय वाहिनी में कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद थी। संगठन के जरिए किसानों, मजदूरों के मसले पर उन्होंने मजबूती से आवाज उठाई।
कई बार ऐसे मौके आए जब वह सरकार के खिलाफ किसान-मजदूरों के साथ दृढ़ता से खड़े रहे। हालांकि उनकी राजनीतिक सक्रियता का केंद्र वाराणसी की जगह लखनऊ रहा। वहां अपने पिता पंडित कमलापति त्रिपाठी को आवंटित सरकारी आवास में रहते थे। 1990 में पंडित कमलापति के निधन के बाद आवास खाली कर वह वाराणसी चले आए।
यहां पैतृक आवास औरंगाबाद में रहने लगे और राजनीतिक सक्रियता से भी अपने को विरत कर लिया। उनके बेटे अंबरीष त्रिपाठी ने बताया कि पिताजी का खेल से भी काफी लगाव था।
कुश्ती, बैडमिंटन और कुश्ती के आयोजनों में वह अक्सर जाया करते थे। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करते थे। वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट कमेटी से भी जुड़े रहे। पौत्र पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी ने कहा कि उनका पूरा जीवन किसानों, मजदूरों के हितों के प्रति समर्पित था।