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शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों के लिए यह संघर्ष का समयः शुभा मुद्गल

शशांक मिश्र, अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 12 Aug 2018 04:58 PM IST
शास्त्रीय गायिका पद्मश्री शुभा मुद्गल
शास्त्रीय गायिका पद्मश्री शुभा मुद्गल - फोटो : अमर उजाला
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संगीत साध्य नहीं साधना है, जो भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर खींच ले जाती है। इस बात को शास्त्रीय गायिका पद्मश्री शुभा मुद्गल से बेहतर कौन जान सकता है। उनके संगीतमयी व्यक्तित्व में ख्याल, ठुमरी और दादरा का ऐसा संगम है जिससे साक्षात्कार करने वाले हर श्रोता का हृदय एक अनूठी अनुभूति से भर जाता है।
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इनके गीत में शास्त्रीय संगीत के रस मिलते हैं तो पॉप म्यूजिक में भी इनका कोई सानी नहीं। ‘प्यार के गीत सुना जा रे...’ ‘अली मोरे अंगना...’ ‘मन के मंजीरे...’से लेकर ‘अब के सावन ऐसे बरसे...’ गीतों की रवानी और ताजगी आज भी वैसी की वैसी है जो संगीत प्रेमियों के दिलों पर छाई है। 

एक कार्यक्रम के सिलसिले में काशी आईं शुभा मुद्गल का मानना है कि संगीत की विधा में हमेशा विद्यार्थी के रूप में रहना चाहिए। हमेशा कुछ अलग सीखने, करने की ललक मन में होनी चाहिए। शास्त्रीय संगीत के साथ ही बॉलीवुड में अपनी एक खास पहचान बना चुकीं शुभा मुद्गल कहती हैं कि आज नवोदित कलाकारों का भविष्य फिल्म में नहीं है।

उनका मानना है कि फिल्मों में अब शास्त्रीय संगीत का भविष्य नहीं है। कहती हैं कि पहले संगीत निर्देशक शास्त्रीय संगीत में निपुण थे। इसका प्रभाव पहले फिल्मों पर दिखता था लेकिन आज तकनीकी और अन्य संसाधनों के प्रयोग के चलते शास्त्रीय संगीत की फिल्मों में उपयोगिता कम हुई है। 

हिंदुस्तानी शास्त्रीय के साथ फिल्मों में बतौर पार्श्वगायिका अपनी पहचान बना चुकीं शुभा मुद्गल कहती हैं कि संगीत में बनारस घराने का बड़ा योगदान है। यहां के कलाकारों की विश्व भर में मान्यता है। पंडित किशन महाराज, ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी, पंडित जसराज, पंडित राजन साजन मिश्र ने इस घराने को विश्व फलक पर पहुंचाया है और ये परंपरा ऐसी ही बनी रहनी चहिए।

उनका मानना है कि पारंपरिक शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहे विद्यार्थियों के लिए यह संघर्ष का समय है। सिर्फ इसके जरिये आजीविका चलाना मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि हम जो कर रहे हैं उसमें नयापन लाएं। इसमें कोई बुराई नहीं है। संगीत के साथ प्रयोग करते रहना चाहिए। 
 
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