बभनियांव में मिला शिवलिंग का चौकोर अरघा, गुप्तकालीन शिवमंदिर का काशी क्षेत्र में पहला साक्ष्य
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वाराणसी के राजातालाब के बभनियांव में चल रही खुदाई में हर दिन बहस्पतिवार को गर्भगृह के पास से शिवलिंग का चौकोर अरघा दिखाई दिया। जटाधारी और एकमुखी शिवलिंग के नीचे मिले चौकोर अरघा से पानी का बहाव उत्तर की ओर जाता दिख रहा है। खुदाई कर रही बीएचयू के प्राचीन इतिहास, पुरातत्व विभाग की टीम के मुताबिक काशी क्षेत्र में प्रारंभिक गुप्तकालीन शिव मंदिर का यह पहला साक्ष्य है।
बीएचयू प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. ओएन सिंह के निर्देशन में प्रो. अशोक सिंह, प्रो. एके दूबे बृहस्पतिवार को खुदाई स्थल पर डटे रहे। प्रो. अशोक सिंह ने बताया कि शिवलिंग का जो चौकोर अरघा मिला है, वह चुनार के पत्थर का बना है।
यहां प्राचीन गुप्तकाल से लेकर कुषाणकाल के कई अहम अवशेष मिल सकते हैं। फिलहाल यहां कुषाणकालीन ईट भी मिला है। बताया कि अरघा उत्तर की तरफ थोड़ा झुका हुआ है। जिसे देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यहां मंदिर जीवंत मंदिर के रूप में है। गुप्त काल में स्थापित इस शिवलिंग की कई सौ वर्षों तक पूजा होती रही होगी।
शिवलिंग पर जल चढ़ाने के भी प्रमाण मिले
प्रोफेसर अशोक सिंह और प्रो. एके दूबे ने बताया कि शिवलिंग पर लंबे समय तक जल चढ़ाने के प्रमाण मिल रहे हैं। क्योंकि अरघा के पत्थर का क्षरण दिख रहा है। शिवलिंग एक वर्ग मीटर के चौकोर पत्थर के अरघे में बीच में काट कर लगाया गया है। आगे की खुदाई में यह भी पता चल सकता है कि अरघे का पूरा हिस्सा एक ही पत्थर के टुकड़े का है या दो टुकड़े जोड़कर यह बनाया गया है। उत्तर की तरफ जहां से मंदिर का पानी आगे की निकलने का प्रमाण मिल रहा है वह नुकीला तथा 16 सेंटीमीटर लंबा है। इस स्थान को जल प्रणाल कहते हैं।
खुदाई में मिले लौह अयस्क
खुदाई में बृहस्पतिवार को लौह अयस्क भी मिले हैं। इसको देखने वालों की भीड़ लग गई। बभनियाव में मिलने वाले पुरावशेष को लेकर कहा जा रहा है कि गुप्त काल में मंदिर में ईटों का प्रयोग कम ही जगहों पर देखने को मिलते है। मंदिर का ऐसा अवशेष कानपुर में भीतरी गांव में मिला है।
खेत में प्राचीनता के इतने महत्वपूर्ण प्रमाण मिलेंगे इसका अंदेशा नहीं था। इस भूमि पर जानकारी के अभाव में पहले सब्जी व पशुओं के लिए चारा उगाते रहे हैं। अध्ययन के लिए यह भूमि भी सरकार द्वारा ले ली जाए तो कोई आपत्ति नहीं होगी।
जय नारायण सिंह, भूमि मालिक
नीचे मंदिर निकलने की बात सुनी तो अपने आप को रोक नहीं पाई। यहां पर दर्शन करने के लिए पैदल ही 5 किलोमीटर दूर से आई हुई हूं। शिवलिंग इतने नीचे कैसे स्थापित है इस बात को लेकर हैरानी है।
मुनक्का देवी, ढढोरपुर
इस स्थान के बारे में समाचार पत्र के माध्यम से जानकारी हुआ तो देखने के लिए चला आया। इस प्राचीनतम अवशेष को देखकर अपने पूर्वजों की श्रद्धा और निर्माण कला के बारे में जानकारी प्राप्त हुई।
प्रसून सिंह, प्रवक्ता, डीएवी इंटर कॉलेजगांव में पग पग पर मिलने वाले प्राचीन मूर्तियों के अवशेष बताते हैं कि गांव समृद्ध शाली परंपरा का अंग रहा है। इस गांव का निवासी होने पर गर्व महसूस होता है। ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई तथा मूर्तियों के संरक्षण के लिए सरकार को विशेष ध्यान देना चाहिए।
अरुण प्रकाश सिंह, बभनियाव