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असि से वरुणा के संगम तक 40 से ज्यादा नाले गंगा को कर रहे मैला, सीवर से प्रदूषित हो रहा गंगाजल

Thu, 12 Dec 2019 04:25 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Thu, 12 Dec 2019 04:25 PM IST
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Sever dirty water flowing in Ganges  from Asi to Varuna confluence in varanasi
रविदास घाट के पास गंगा में सीधे गिर रहा नगवां नाले से गंदा पानी। - फोटो : अमर उजाला।

मोक्षदायिनी गंगा में प्रदूषण का स्तर कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। एनजीटी के आदेश के बाद प्रशासनिक लापरवाही गंगाजल पर भारी पड़ रही है। सोमवार को एनजीटी के  चेयरमैन ने अधिकारियों को सख्त आदेश दिया था कि माघ मेले के स्नान से पहले गंगा में गिरने वाले नालों को बंद कराया जाए। उन्होंने राजघाट से अस्सी तक जलनिगम के अधिकारियों के साथ गंगा में गिरने वाले नालों की हकीकत को भी देखा था। बुधवार को जब राजघाट से अस्सी तक गंगा की पड़ताल की गई तो स्थितियां काफी खराब मिलीं।

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अस्सी से राजघाट तक 40 से अधिक छोटे-बड़े नाले सीधे गंगा में गिर रहे हैं। खिड़किया घाट पर पड़ताल के दौरान वरुणा और गंगा के संगम पर स्थिति बेहद खराब नजर आई। जल से उठ रही बदबू तो गंगा किनारे खड़े होने भी नहीं होने दे रही है। वरुणा गंगा के संगम पर गंगा की दशा देखकर कोई नहीं कह सकता है कि कभी भगवान विष्णु ने यहीं अपने पद पखारे होंगे।
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विष्णुपादोदित तीर्थ के रूप में मशहूर वरुणा गंगा के संगम पर अब सिर्फ शहर के सीवेज से लबालब वरुणा का पानी गंगा में निरंतर प्रवाहित हो रहा है। हालत ऐसी है कि इसके आसपास खड़ा होना भी मुश्किल है। आदिकेशव से लेकर गायघाट तक स्थितियां बेहद भयावह हो चुकी हैं।
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कहीं जानवर मरे पड़े हैं तो कहीं शहर के नाले का पानी गंगा में गिर रहा है। आदिकेशव घाट के थोड़ा पहले स्थित वरुणा गंगा के संगम पर शहर की पूरी गंदगी, सीवर और नालों के पानी को समेटे हुए वरुणा बेधड़क, बेलौस होकर गंगा में गिर रही है। गंदगी का आलम यह है कि इसके आसपास जलीय जीवों और आम लोगों की आवाजाही पूरी तरह से बंद हो चुकी है।

बदबू के कारण वहां पर दो मिनट खड़ा होना भी बेहद मुश्किल है। आदिकेशव घाट पर से सीधा नाला गंगा में आकर मिल रहा है। इसके आगे जब हम खिड़किया घाट की तरफ बढ़ते हैं तो तेज आवाज करता हुआ नाला भी तेजी से गंगा में गिर रहा है। भैंसासुर घाट, रानी घाट, प्रहलाद घाट, सक्का घाट, तेलियानाला घाट, नदेंश्वर घाट, गोला घाट और गायघाट तक छोटे-छोटे नालों से पानी होकर सीधे गंगा में गिर रहा है।

40 से अधिक नाले गिर रहे गंगा में 
अस्सी से राजघाट तक 40 से अधिक छोटे-बड़े नाले सीधे गंगा में गिर रहे हैं। आंकड़ों की बात करें तो शहर में रोजाना 300 एमलडी सीवेज निकलता है। सरकारी दावा है कि दो सौ एमएलडी का तो ट्रीटमेंट किया जाता है लेकिन सौ एमएलडी सीवेज सीधे गंगा में गिर रहा है। सरकारी आंकड़े सौ एमएलडी का दावा कर रहे हैं लेकिन हकीकत इससे ज्यादा खतरनाक है। गंगा के उस पार रामनगर से भी कारखानों का विषैला कचरा नालों के जरिए पहुंच रहा है। वहीं फीकल कॉलीफार्म की संख्या भी पिछले तीन सालों में आठ गुना अधिक हुई है। 

आठ घाटों से आ रहा है विषैला कचरा
रामनगर में आठ घाटों से गंदा पानी सीधे गंगा में मिल रहा है। टेंगरा मोड़ स्थित घूरा नाला, श्मशान घाट के समीप शाही नाला और इंडस्ट्रियल एरिया की फैक्ट्रियों का विषैला कचरा नालों के जरिए गंगा में घुल रहा है। इसके अलावा नोनियौट घाट, बलुआ घाट, उड़िया घाट, सलोतरी घाट तथा शक्ति घाट से भी सीवर का पानी गंगा में ही छोड़ा जा रहा है।

शाही नाला सीधे गिर रहा गंगा में
खिड़किया घाट पर रोजाना स्नान करने वालों का कहना है कि शाही नाले से अक्सर गंदा पानी गंगा में गिरता है। इसके अलावा सक्का घाट, गोला घाट, रानी घाट, नया घाट, बूंदी परकोटा घाट पर भी नाले का पानी सीधे गंगा में जा रहा है। घाट के किनारे बने घरों का सीवर भी सीधे गंगा में ही गिराया जाता है। 

असि नदी है सबसे बड़ी वजह
शहर के आधे हिस्से के सीवर का पानी नालों से होकर असि में मिलता है। 14 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र वाली नदी में रोजाना तीन करोड़ लीटर पानी बहता है। आठ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद असि नदी से प्रतिदिन गंगा नदी में 50 एमएलडी से अधिक सीवर गंगा में गिर रहा है। 

ठप है रमना का काम
गंगा को असि नदी के प्रदूषण से बचाने के लिए रमना में 102 करोड़ रुपये की लागत से एसटीपी का निर्माण किया जा रहा था, जिसे नवंबर 2019 में पूरा होना था लेकिन इसका काम रुका हुआ है। नमामि गंगे परियोजना के तहत रमना में एसटीपी निर्माण कार्य शुरू हुआ। पीपीपी मोड पर बनने वाले इस प्लांट को बनाने का जिम्मा एसएल कंपनी ने लिया। इसमें 40 करोड़ 80 लाख रुपये नमामि गंगे को और बाकी का पैसा कंपनी को लगाना था। कंपनी ने लोन लिया लेकिन बैंक और कंपनी के कुछ विवाद के चलते पेमेंट रुक गया है।

रामनगर एसटीपी की मानसून ने रोकी रफ्तार
रामनगर में 72.91 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले एसटीपी की आधारशिला पीएम मोदी ने नवंबर 2018 में रखी थी लेकिन मार्च 2019 में काम शुरू हुआ। बरसात के कारण बीच में काम बंद हो गया। गंगा का जलस्तर कम होने के बाद काम शुरू तो हो गया है लेकिन अधिकारियों का दावा है कि जुलाई 2020 तक काम पूर्ण होगा। 

पांच एसटीपी कर रहे हैं काम
जिले में इस समय कुल पांच सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट चालू हालत में हैं। इनमें 9. 8 एमएलडी क्षमता का भगवानपुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, 80 एमएलडी का दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, 12 एमएलडी का डीएलडब्लू सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, 170 करोड़ की लागत से बने 140 एमएलडी दीनापुर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और 118 करोड़ से 120 एमएलडी गोईठहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शामिल है।

क्षमता से चौथाई हो रहा है शोधन
गोइठहां में बने एसटीपी से मात्र 25 प्रतिशत ही सीवर का शोधन किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इस ट्रीटमेंट प्लांट में इतना ही सीवर पहुंच पा रहा है, इस वजह से यह प्लांट क्षमता के मुताबिक ट्रीटमेंट नहीं कर पा रहा है।

दीनापुर एसटीपी से बिना शोधन के ही गंगा में जा रहा सीवेज
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में दीनापुर और भगवानपुर एसटीपी के गड़बड़ियां मिली थीं। दीनापुर एसटीपी से तो बिना शोधन के ही गंगा में सीवेज प्रवाहित करने का मामला सामने आया था। इस मामले में जलनिगम पर भी जुर्माना लगाया गया था।

वरुणा के किनारे खड़ा होना मुहाल
वरुणा नदी के किनारे तो खड़े होना भी मुश्किल है। चौकाघाट, बघवानाला, नक्खीघाट में नाले का पानी सीधे वरुणा नदी में जाता है। चौका घाट के समीप दुर्गंध उठती है। वहां पर सीवर का प्रवाह सीधे नदी में हो रहा है। 

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम नियमित रूप से एसटीपी की जांच कर रही है। पिछले माह दीनापुर एसटीपी में गड़बड़ी मिलने पर जुर्माना भी लगाया गया था। -
कालिका सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

रोजाना 300 एमएलडी सीवेज शहर से निकल रहा है। मौजूदा एसटीपी से दो सौ एमलडी का ट्रीटमेंट किया जा रहा है। - एसके राय, महाप्रबंधक, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई

काशी के गंगाजल में पिछले तीन सालों में फीकल कॉलीफार्म की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। इससे पता चलता है कि गंगा में सीवेज की भारी मात्रा प्रवाहित हो रही है। - प्रो. बीडी त्रिपाठी, नदी विज्ञानी, बीएचयू

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