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नवरात्र का दूसरा दिन: बोल साचे दरबार की... के नारे से गूंजा परिसर, मां ब्रह्मचारिणी का दर्शन कर भक्त हुए निहाल

Fri, 04 Oct 2024 10:27 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Fri, 04 Oct 2024 10:27 AM IST
सार

Varanasi News: मंदिर परिसर में भक्तों की सुरक्षा के बाबत पुलिस प्रशासन भी तैनात रहा। एक-एक कर भक्तों को प्रवेश द्वार से मंदिर में भेजा जा रहा था।

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Second day of Navratri premises resonated slogan Bol Sachche Darbar Ki devotees worship Maa Brahmacharini
मां ब्रह्मचारिणी का किया गया भव्य श्रृंगार। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन यानी शुक्रवार को मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी रही। सुबह से ही भक्त मां के जयकारे लगाते हुए दुर्गाघाट स्थित मंदिर के बाहर खड़े हो गए थे। मां की भव्य आरती के बाद पूजन-अर्चन कर भक्त निहाल हो गए। 

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मां ब्रह्मचारिणी, देवी दुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं। इनके दर्शन पूजन से धन-धान्य और सुख-समृद्धि मिलती है। माना जाता है कि ब्रह्मचारिणी ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था। उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी।
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शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ‘देवी ब्रह्मचारिणी’ रूप की पूजा करने का विधान है। जो कोतवाली थाना अंतर्गत दुर्गा घाट पर मां गंगा के तट पर विराजमान हैं। मां ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमण्डल है। शास्त्रों में बताया गया है कि मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी।
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हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा। उन्हें त्याग और तपस्या की देवी माना जाता है। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया। इनके इसी रूप की पूजा और स्तवन दूसरे नवरात्र पर किया जाता है।
 

अनोखी है पौराणिक मान्यता
मंदिर के सेवादार के अनुसार, देवी ब्रह्मचारिणी भगवती दुर्गा की नव शक्तियों में इनका दूसरा रूप माना जाता है। शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि माता ब्रह्मचारिणी पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर मैना के गर्भ से उत्पन्न हुईं। देवर्षि नारद के कहने पर माता ब्रम्हचारिणी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए जंगल में जाकर हजारों वर्ष केवल फल खाकर कठिन तपस्या की। पुनः शिव को विशेष प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मचारिणी ने 3000 वर्ष तक वृक्षों से गिरे सूखे पत्तों को खाकर कठिन तपस्या की।

ब्रह्मचारिणी मां की उपासना एवं आराधना करने से भक्तों को अनेक प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती हैं, जैसे तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार इत्यादि की वृद्धि होती है। इनकी कृपा से भक्तों को सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है और जो बच्चे पढ़ने में कमजोर है उन्हें मां ब्रह्मचारिणी के दर्शन मात्र से जीवन के सभी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होती है एवं जीवन की अनेक प्रकार की परेशानियां भी समाप्त हो जाती हैं। मां का दर्शन करने के लिए भोर से ही भक्तो  ने लाइन लगा ली थी।

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