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काशी का अनोखा मंदिर: अग्नि स्वरूप में विराजमान है धरती का सबसे प्राचीन शिवलिंग, अद्भुत है मान्यता और इतिहास
Sun, 11 Aug 2024 02:55 PM IST
प्रगति चंद
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Sun, 11 Aug 2024 02:55 PM IST
सार
काशी मंदिरों, परंपराओं व संस्कृतियों से घिरा हुआ शहर है। यहां भगवान शिव के विभिन्न मंदिर हैं। इनमें कई मंदिरों की कहानियां अद्भुत हैं। इसी क्रम में आत्मवीरेश्वर महादेव का मंदिर है। इनकी कृपा से स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था।
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आत्मवीरेश्वर महादेव मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
काशी के गंगा घाट के किनारे तंग गलियों में आत्मवीरेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ की आत्मा यहीं बसती है, इसलिए इसका नाम आत्मवीरेश्वर महादेव है। काशी के पंचमुद्रा पीठ पर सिंधिया घाट के पास भगवान शिव अग्नि के रूप में विराजमान हैं। भगवान वीरेश्वर के समान सिद्धि और शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का प्रदान करने वाला दूसरा शिवलिंग नहीं है। इसे धरती का सबसे प्राचीन शिवलिंग भी माना जाता है।
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सिंधिया घाट पर विराजमान आत्मवीरेश्वर महादेव के मंदिर में आने वाले भक्त संतति की कामना से आते हैं। भगवान आत्मवीरेश्वर महादेव का शृंगार, शाम की सप्तऋषि आरती, शयन आरती काशी विश्वनाथ मंदिर की तरह ही संपन्न होती है।
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स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त और मां भुवनेश्वरी देवी ने पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए आत्मवीरेश्वर मंदिर में अनुष्ठान किया था। एक वर्ष के अनुष्ठान के बाद बाद स्वामी विवेकानंद जैसा ओजस्वी और तेजस्वी बालक उत्पन्न हुआ। स्वामी विवेकानंद का मुंडन संस्कार भी यहीं पर कराया गया था।
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ये है इतिहास
काशीखंड के अनुसार राजा अमित्रजीत और उनकी पत्नी मलयगंधिनी को माता गौरी के आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ। बालक के मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण रानी ने जन्म लेते ही उसे त्याग दिया। दासियों ने बालक को संकटा देवी के सम्मुख छोड़ दिया। मां संकटा के आदेश से मातृकाओं ने बच्चे का पालन किया और उसे पंचमुद्रा पीठ पर पहुंचा दिया।
बालक ने पंचमुद्रा पीठ पर शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की तपस्या शुरू कर दी। बालक की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने बालक से कहा मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, वर मांगो।
बालक ने महादेव से वहीं विराजमान होने के साथ बिना अभीष्ट मुद्रा एवं मंत्रजप के भक्तों को केवल दर्शन व स्पर्श से अभीष्ट सिद्धि देने का वर मांगा। भगवान शिव ने कहा, हे वीर तुम्हारे ही नाम से यह लिंग वीरेश्वर नाम से जाना जाएगा और काशी में भक्तों को अभीष्ट सिद्धि देता रहेगा। इसके बाद भगवान शिव के आशीर्वाद से वीरेश्वर ने समस्त संसार पर राज्य किया।
बालक ने पंचमुद्रा पीठ पर शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की तपस्या शुरू कर दी। बालक की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने बालक से कहा मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, वर मांगो।
बालक ने महादेव से वहीं विराजमान होने के साथ बिना अभीष्ट मुद्रा एवं मंत्रजप के भक्तों को केवल दर्शन व स्पर्श से अभीष्ट सिद्धि देने का वर मांगा। भगवान शिव ने कहा, हे वीर तुम्हारे ही नाम से यह लिंग वीरेश्वर नाम से जाना जाएगा और काशी में भक्तों को अभीष्ट सिद्धि देता रहेगा। इसके बाद भगवान शिव के आशीर्वाद से वीरेश्वर ने समस्त संसार पर राज्य किया।