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काशी में पिंडदान करके मैंने दत्त साहब को दिया वचन पूरा कियाः संजय दत्त

Thu, 14 Sep 2017 01:55 PM IST
amarujala.com, written by- पंकज शुक्ल
amarujala.com, written by- पंकज शुक्ल Updated Thu, 14 Sep 2017 01:55 PM IST
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sanjay dutt fullfill his promise to father says in varanasi
बोले कि ‘माता पिता की ना सुनने का खामियाजा उठाना ही होता है’ - फोटो : अमर उजाला
संजय दत्त का क्रेज बुधवार को दिन भर काशी में कलरव करता रहा। वह जहां भी गए लोगों का हुजूम उनके पीछे हो लिया। संजय दत्त उत्तर प्रदेश के नं. 1 अखबार अमर उजाला के आमंत्रण पर यहां आए। अमर उजाला परिसर में अपने फैंस के साथ खूब सेल्फी खिंचाई।
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अखबार की संपादकीय टीम के साथ एक्सक्लूसिव संवाद किया और फिर रोहनिया के डालिम्स सनबीम स्कूल भी गए बच्चों को ये समझाने कि माता पिता जो कहते हैं, उसे जरूर मानना चाहिए, ऐसा न करने के नतीजे ठीक नहीं होते।
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और फिर, अमर उजाला के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में संजय दत्त ने दिल का वो कोना खोल दिया, जिस पर से परतें उधेड़ने को न जाने कब से उनका मन फड़फड़ा रहा था। वह बोले, दत्त साब ने मुझे बरसों पहले कहा था कि मुझे कुछ हो जाए तो मेरा पिंड दान तभी करना जब पूरी तरह आजाद हो जाना।
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12 साल हो गए उन्हें गुजरे और मैंने उनकी इसी बात पर उनका अब तक पिंड दान नहीं किया। अब जबकि मुझ पर से सारे आरोप हट चुके हैं, सारे गुनाहों की सजा काट चुका हूं तब मैं पिंडदान करने काशी आया हूं। और, शायद दत्त साहब भी इसी दिन का इंतजार कर रहे थे।

मैं घाट पर पहुंचा तो बूंदाबांदी शुरू हुई और जैसे ही पिंड दान खत्म हुआ बारिश रुक गई। इन बूंदों से मुझे उनका आशीर्वाद मिल गया। आज वाराणसी आकर मेरा मन शांत हो गया है।

पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम से बदल गए संजय दत्त

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संजय दत्त - फोटो : अमर उजाला
संजय दत्त ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम में उन्हें पूरी तरह बदल दिया है। उनके भीतर का गुस्सा पूरी तरह खत्म हो चुका है। अब वह कोई प्रतिक्रिया तुरंत नहीं करते, पहले गुस्से को ठंडा होने देते हैं, फिर कुछ कहते हैं।

गुस्सा या कोई भी भावना हो, अगर उसे थोड़ी देर रोक लिया जाए तो बहुत सारी बातें, बहुत सारे अपराध होते ही नहीं। गुरुग्राम के रायन स्कूल हत्याकांड के बारे में पूछने पर कहा कि ये सब देखकर मुझे बहुत डर लगता है।

एक बाप के तौर पर मैं सहम जाता हूं। मेरे दोनों छोटे बच्चे स्कूल जाते हैं। किसी बच्चे के साथ ऐसा होते सुनना ही अंदर तक हिला देता है। ऐसे लोगों के लिए तो अलग से सजा होनी चाहिए। कायदा कानून जो भी हो उसे लागू करके तुरंत और सीधे सजा देनी चाहिए।
 

‘भूमि ही हो सकती थी मेरी कमबैक फिल्म’

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sanjay dutt - फोटो : अमर उजाला
फरवरी 2016 में रिहा होने के बाद संजय दत्त की पहली फिल्म ‘भूमि’ इस महीने 22 तारीख को रिलीज हो रही है। अपनी वापसी के लिए इसी फिल्म को चुनने की वजह पूछने पर संजय दत्त ने कहा, मैंने फिल्मों में वापसी का मन बनाया तो मेरे पास एक साथ पांच स्क्रिप्ट आईं।

लेकिन मैं अब आम हीरो जैसे रोल नहीं करना चाहता। मैं अपनी उम्र को अब परदे पर जीना चाहता हूं। और, इस फिल्म में मुझे पिता का रोल मिला। मैं भी पिता का रोल करना चाहता था। एक बेटी का पिता होना आसान नहीं हैं। बेटियां हमारे लिए अनमोल होती हैं। हम बार-बार कहते हैं बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ।

हम बेटियां बचाते भी हैं। बेटियों को पढ़ाते भी हैं। लेकिन, बेटियां जो करना चाहती हैं या बनना चाहती हैं, कई बार उसमें खुद ही रोड़ा बन जाते हैं। मेरा कहना है, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और बेटी बनाओ भी।

जैसा कि मेरी इस फिल्म का संवाद है, ‘बेटियों के मायके होते हैं, ससुराल होती है लेकिन, घर नहीं होते’। हम चाहें तो भी बेटियों को घर पर नहीं रख पाते। बेटियों को जाना ही होता है। तो जब उसे जाना ही है तो जाने से पहले उसका दिल क्यूं दुखाना?

काशी में पिंडदान करना ईश्वरीय संदेश

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पिंडदान करते संजय दत्त - फोटो : अमर उजाला
अपने पिता सुनील दत्त को संजय दत्त बहुत मिस करते हैं। और, शायद अब भी कहीं न कहीं प्रायश्चित के ताप में जल रहे हैं। पिता का जिक्र करने पर संजय दत्त ने कहा कि मेरे और दत्त साहब के बीच का जो रिश्ता ऐसा है कि जिसमें एक दो-बार ही मैंने उनकी बात नहीं मानी और जब भी नहीं मानी उसका खामियाजा भुगता।

वह बोले, जैसा कि मैंने आपको बताया कि पिंडदान 2017 में काशी आकर क्यों किया तो इसके पीछे शायद काशी की भूमि का भी कुछ प्रताप है। मैं पहले इस पितृपक्ष में नासिक में पिंडदान करना चाहता था।

तब तक ‘अमर उजाला’ का निमंत्रण मुझे मिला और वह भी वाराणसी आने का निमंत्रण मिला। मुझे लगा कि ये ईश्वरीय संदेश है और मैंने इसे मान लिया। आज जो पिंडदान करते समय आसमान से अमृत बरसा, उसने बता दिया  कि काशी का पिंडदान ही पूर्वजों के लिए संतानों का किया महाकर्म है।
 
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