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रूट इलेक्ट्रिक हो या सामान्य, नहीं बदलने होंगे रेल इंजन
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
Updated Sun, 31 May 2015 02:11 AM IST
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डीजल इंजन रेल कारखाना (डीरेका) देश का पहला ऐसा इंजन तैयार करने जा रहा है जो डीजल और बिजली दोनों से चलेेगा। इसके निर्माण के बाद रूट इलेक्ट्रिफाइड हो या सामान्य, इंजन बदलने की जरूरत नहीं रह जाएगी। इससे रेलवे और यात्रियों दोनों को फायदा होगा।
इलेक्ट्रिफाइड रूट से सामान्य या फिर सामान्य से इलेक्ट्रिफाइड रूट पर जाने पर इंजन बदलने में जो ईंधन और समय लगता है, उसकी बचत होगी। यात्रियों का सफर जल्दी समाप्त होगा और ट्रेनों के समयबद्ध संचालन में मदद मिलेगी। रेलवे बोर्ड के निर्देश पर इलेक्ट्रिक इंजन निर्माण की दिशा में डीरेका का यह पहला कदम है। इस डुअल मोड लोको के निर्माण का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को भेज दिया गया है। वहां से स्वीकृति मिलते ही इसके निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।
इलेक्ट्रिफाइड रूट से सामान्य रूट पर जाने से पहले ट्रेनों को रोककर डीजल इंजन लगाना पड़ता है। यही प्रक्रिया सामान्य रूट से इलेक्ट्रिफाइड रूट पर जाने से पहले अपनाई जाती है। इलेक्ट्रिक इंजन लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में कर्मचारियों की मशक्कत के साथ ही आधे घंटे से अधिक का समय जाया होता है। ईंधन की खपत होती है सो अलग। भी इंजनों की अदला-बदली में लगने वाले समय के चलते ट्रेनों के समयबद्ध संचालन में भी दिक्कतें आती हैं। रेल मंत्रालय के निर्देश पर अब डीरेका ऐसा इंजन बनाने की राह पर है जो डीजल और बिजली दोनों से चलेगा।
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जहां तक रूट इलेक्ट्रिफाइड होगा वहां तक बिजली से और जहां रूट इलेक्ट्रिफाइड नहीं होगा वहां डीजल से चलेगा। इसमें डीजल रेल इंजन की क्षमता 4500 अश्व शक्ति जबकि इलेक्ट्रिक रेल इंजन की क्षमता लगभग 5000 अश्व शक्ति रखने की योजना है। डीजल लोकोमोटिव वर्कशाप की कोशिश होगी कि रेल इंजन के आकार में कोई खास बदलाव न आए। डीरेका अब तक हर वर्ष औसतन ढाई सौ से तीन सौ रेल इंजनों का उत्पादन करता है।
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इलेक्ट्रिफाइड रूट से सामान्य या फिर सामान्य से इलेक्ट्रिफाइड रूट पर जाने पर इंजन बदलने में जो ईंधन और समय लगता है, उसकी बचत होगी। यात्रियों का सफर जल्दी समाप्त होगा और ट्रेनों के समयबद्ध संचालन में मदद मिलेगी। रेलवे बोर्ड के निर्देश पर इलेक्ट्रिक इंजन निर्माण की दिशा में डीरेका का यह पहला कदम है। इस डुअल मोड लोको के निर्माण का प्रस्ताव रेल मंत्रालय को भेज दिया गया है। वहां से स्वीकृति मिलते ही इसके निर्माण का काम शुरू हो जाएगा।
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इलेक्ट्रिफाइड रूट से सामान्य रूट पर जाने से पहले ट्रेनों को रोककर डीजल इंजन लगाना पड़ता है। यही प्रक्रिया सामान्य रूट से इलेक्ट्रिफाइड रूट पर जाने से पहले अपनाई जाती है। इलेक्ट्रिक इंजन लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में कर्मचारियों की मशक्कत के साथ ही आधे घंटे से अधिक का समय जाया होता है। ईंधन की खपत होती है सो अलग। भी इंजनों की अदला-बदली में लगने वाले समय के चलते ट्रेनों के समयबद्ध संचालन में भी दिक्कतें आती हैं। रेल मंत्रालय के निर्देश पर अब डीरेका ऐसा इंजन बनाने की राह पर है जो डीजल और बिजली दोनों से चलेगा।
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जहां तक रूट इलेक्ट्रिफाइड होगा वहां तक बिजली से और जहां रूट इलेक्ट्रिफाइड नहीं होगा वहां डीजल से चलेगा। इसमें डीजल रेल इंजन की क्षमता 4500 अश्व शक्ति जबकि इलेक्ट्रिक रेल इंजन की क्षमता लगभग 5000 अश्व शक्ति रखने की योजना है। डीजल लोकोमोटिव वर्कशाप की कोशिश होगी कि रेल इंजन के आकार में कोई खास बदलाव न आए। डीरेका अब तक हर वर्ष औसतन ढाई सौ से तीन सौ रेल इंजनों का उत्पादन करता है।