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ताल गुरु की चिता सजी तो श्मशान पर गूंजने लगे ताल
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 30 Jul 2016 02:21 AM IST
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विख्यात तबला वादक पं. लच्छू महाराज का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन
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ताल गुरु पं. लच्छू महाराज का पार्थिव शरीर शुक्रवार की सुबह मणिकर्णिका महाश्मशान पर पंचतत्व में विलीन हो गया। ताल के साधक के अंतिम संस्कार के वक्त श्मशान पर सचमुच ताल गूंजने लगे। एक तरफ श्मशानेश्वर महादेव की घंटे-घड़ियाल के साथ आरती शुरू हुई और दूसरी ओर चिता पर उनको मुखाग्नि दी जा रही थी। उनकी अंतिम यात्रा तहजीब की मिसाल बन गई। अंतिम यात्रा में हिंदुओं के साथ मुसलमान भी शामिल हुए और अर्थी को कंधा भी दिया। नश्वर शरीर के पंचतत्व में विलीन होते वक्त बनारस घराने के कलाकारों, चाहने वालों की आंखें नम हो गईं। बुधवार की रात हृदय गति रुकने से पं. लच्छू महाराज का निधन हो गया था।
बूंदाबादी के बीच पं. लच्छू महाराज के पार्थिव शरीर को भोर में तीन बजे ही भिखारीपुर स्थित एपेक्स हॉस्पिटल से भोगाबीर स्थित उनके आवास पर लाया गया। यहां अर्थी सजाई गई। इसके बाद उनके शव को वाहन पर रखकर दालमंडी स्थित साधना स्थली तक लाया गया। यहां उनके पार्थिव शरीर को सुबह पांच बजे से अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। लच्छू महाराज के अंतिम दर्शन के लिए काशी के कलाकारों के अलावा शुभेच्छुओं और शिष्यों की भीड़ लग गई। सुबह आठ बजे दालमंडी से अंतिम यात्रा निकली।
खास बात यह थी कि आखिरी नमन के लिए दालमंडी के तमाम मुसलमान भी शवयात्रा में शामिल हुए। मणिकर्णिका घाट पर चिता सजाने के बाद उनका तबला बनाने वाले रौजन खां, कामरान खां ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। मुखाग्नि उनके छोटे भाई जय नारायण सिंह ने दी। इस मौके पर शमशेर मेहंदी, सितार वादक प्रो. राजेश शाह, तबला वादक ड़ॉ. प्रवीण उद्धव, गायक अशोक झा, तबला वादक पं. किशन राम डोहकर, कथक पं. नर्तक माता प्रसाद, कथक क्वीन सितारा देवी के पोते कथक नर्तक विशाल कृष्ण समेत बनारस घराने के तमाम कला साधक मौजूद थे।
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बूंदाबादी के बीच पं. लच्छू महाराज के पार्थिव शरीर को भोर में तीन बजे ही भिखारीपुर स्थित एपेक्स हॉस्पिटल से भोगाबीर स्थित उनके आवास पर लाया गया। यहां अर्थी सजाई गई। इसके बाद उनके शव को वाहन पर रखकर दालमंडी स्थित साधना स्थली तक लाया गया। यहां उनके पार्थिव शरीर को सुबह पांच बजे से अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। लच्छू महाराज के अंतिम दर्शन के लिए काशी के कलाकारों के अलावा शुभेच्छुओं और शिष्यों की भीड़ लग गई। सुबह आठ बजे दालमंडी से अंतिम यात्रा निकली।
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खास बात यह थी कि आखिरी नमन के लिए दालमंडी के तमाम मुसलमान भी शवयात्रा में शामिल हुए। मणिकर्णिका घाट पर चिता सजाने के बाद उनका तबला बनाने वाले रौजन खां, कामरान खां ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। मुखाग्नि उनके छोटे भाई जय नारायण सिंह ने दी। इस मौके पर शमशेर मेहंदी, सितार वादक प्रो. राजेश शाह, तबला वादक ड़ॉ. प्रवीण उद्धव, गायक अशोक झा, तबला वादक पं. किशन राम डोहकर, कथक पं. नर्तक माता प्रसाद, कथक क्वीन सितारा देवी के पोते कथक नर्तक विशाल कृष्ण समेत बनारस घराने के तमाम कला साधक मौजूद थे।
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