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Varanasi : पूर्वांचल की पहचान बनेगा लाल-सफेद चंदन, तैयार होंगे जंगल; अलग-अलग जिलों में किया जाएगा संरक्षित
Fri, 26 Jan 2024 05:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 26 Jan 2024 05:40 AM IST
सार
पहले खेप में वाराणसी से लेकर मऊ तक के बीच लाल व सफेद चंदन के साथ दुर्लभ व औषधियुक्त मिलिया-डूबिया व काला शीशम प्रजाति के पौधों के जंगल तैयार किए जाएंगे। पूर्वांचल से गायब हो चुके दुर्लभ व औषधियुक्त पौधों को संरक्षित करने का जिम्मा वन वर्धिनिकी विन्ध्य क्षेत्र ने उठाया है।
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लाल चंदन की लकड़ी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सीमा के बीच बसे शेषाचलम जंगल की तरह लाल चंदन अब पूर्वांचल की नई पहचान बनेगा। पहले खेप में वाराणसी से लेकर मऊ तक के बीच लाल व सफेद चंदन के साथ दुर्लभ व औषधियुक्त मिलिया-डूबिया व काला शीशम प्रजाति के पौधों के जंगल तैयार किए जाएंगे। पूर्वांचल से गायब हो चुके दुर्लभ व औषधियुक्त पौधों को संरक्षित करने का जिम्मा वन वर्धिनिकी विन्ध्य क्षेत्र ने उठाया है।
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इसके लिए विभाग ने लखनऊ के एक निजी शोध संस्थान से बीज की खरीददारी भी कर ली है। चारों प्रजाति के विलुप्त हो गए पेड़ों के लगभग 10 हजार पौधे उगाने का लक्ष्य रखा गया है। मौसम अनुकूल रहा तो फरवरी के प्रथम सप्ताह में इन बीजों को बोया जाएगा। इसके लिए मऊ में नर्सरी तैयार हो गई है। बोने के लगभग तीन माह में इन बीजों को पौधे बनने में लगेंगे। इसके बाद इसे वाराणसी के पिंडरा, रोहनिया और मऊ स्थित वन देवी जंगल में लगाया जाएगा।
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वन वर्धिनिकी विन्ध्य क्षेत्र से जुड़े दिनेश कुमार चौहान ने बताया कि चंदन के लिए जरूरी जलवायु पूर्वांचल में मौजूद है। वन विभाग के शोध में यह क्षेत्र चंदन के जंगल के लिए मुफीद पाया गया है। यहां की चिकनी उपजाऊ मिट्टी पर हर साल होने वाली 400 से 700 मिलीमीटर बारिश और 10 से 35 डिग्री का तापमान, इन पौधों के विकास में अहम योगदान देगा।
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8 से 10 वर्ष में परिपक्व होंगे चंदन के पेड़
चंदन एक परोपजीवी पेड़ है, जिसकी ऊंचाई 18-20 मीटर होती है। आयु वृद्धि के साथ उसके तने और जड़ों की लकड़ी में सुगंधित तेल का अंश बढ़ता जाता है। इसे परिपक्व होने में 8-12 साल लगते हैं। इसके लिए ढाल और जल सोखने वाली मिट्टी मुफीद होती है।
बजट के अभाव में नहीं संरक्षित हो रहे दुर्लभ पौधे
रामनगर स्थित वन वर्धिनिकी विन्ध्य क्षेत्र से 22 जिलों में पौधों की गणना के साथ ही उनके अनुसंधान का काम होता है। हालांकि इन दिनों कर्मचारियों की कमी के चलते काम अटके हैं। वन वर्धिनिकी के वरिष्ठ सहायक दिनेश कुमार चौहान ने बताया कि यहां से झांसी, चित्रकूट, मिर्जापुर, सोनभद्र, मऊ, चंदौली, वाराणसी, भदोही, आजमगढ़, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, बुंदेलखंड सहित कुल 22 जिलों में पौधों को संरक्षित करने की जिम्मेदारी है। अभी बजट व कर्मचारियों के अभाव में कुछ खास नहीं हो पा रहा है।
लाल व सफेद चंदन के अलावा शीशम, मिमिया डूबिया जैसे दुर्लभ व औषधियुक्त विलुप्त हो रहे पौधे के संरक्षण का लक्ष्य है। फरवरी के पहले सप्ताह में बीज बोने की तैयारी है।
- शेष नारायण मिश्र, मुख्य वन संरक्षक, वन वर्धिनिकी विंध्य क्षेत्र