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UP: काशी में गंगा के तट पर सजा मूर्खों का मेला, महिला दूल्हा और पुरुष दुल्हन की कराई गई शादी; रातभर लगे ठहाके

Tue, 02 Apr 2024 02:23 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Tue, 02 Apr 2024 02:23 PM IST
सार

काशी में गंगा के तट पर देश भर के मूर्खों का मेला सजा। इस दौरान महिला दूल्हा और पुरुष दुल्हन की शादी कराई गई। मूर्खों के मेले में रात भर ठहाके लगते रहे। इस दौरान हास्य कवि शंभू शिखर को 2024 का महामूर्ख सम्मान मिला। 

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Rajendra Prasad Ghat of Kashi presentation of comic poets in fair of fools
Varanasi News - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अगड़म बगड़म जूता रगड़म, ब्याह कराऊं पकड़म धकड़म...के उटपटांग मंत्रों से गंगा किनारे डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट पर विवाह की रस्में निभाई जा रही हैं। महिला दूल्हा और पुरुष दुल्हन की शादी करा रहा पुरोहित मंत्रों को उलट-पलट कर बोल रहा है और सामने बैठी जनता पेट पकड़कर हंस रही है। यह नजारा महामूर्ख मेले में नजर आया। इस अवसर पर महामूर्ख सम्मान के तहत रावण मुकुट और हनुमान जी की गदा हास्य कवि शंभू शिखर को प्रदान किया गया।

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शनिवार गोष्ठी की ओर से आयोजित महामूर्ख मेले में देश भर के मूर्खों की जुटान हुई। मेले की शुरूआत गधे की चीपो-चीपो से हुई। शहर के चिकित्सक डॉ. कर्मराज सिंह दुल्हन और डॉ. नूतन सिंह दूल्हा बनकर मंच पर पहुंचीं। ऊटपटांग, अवैदिक और अर्थशून्य मंत्र पढ़ते हुए अनिल यादव बंटी सरदार ने विवाह की रस्म पूरी कराई। विवाह होते होते ही दूल्हा-दुल्हन में विवाद हो गया। 
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दूल्हे ने आव देखा न ताव मंच पर पहुंचकर ऐलान कर दिया कि यह शादी उसे मंजूर नहीं है। वह दुल्हन को तलाक दे रहा है। मंच पर मौजूद कवियों ने जोड़े को एक साल तक साथ रहकर कोई निर्णय करने की सलाह दी लेकिन महिला दूल्हा ने किसी की सलाह मानने से इंकार कर दिया। इससे पूर्व महामूर्ख मेले के मंच पर मूर्खता कायम रखने की शाश्वत शपथ के साथ कार्यक्रम का आगाज हुआ।

चिरबुजुर्ग कवि सांड बनारसी ने सभी को शपथ दिलाते हुए कहा कि हम शपथ लेते हैं कि हम मूर्ख पैदा हुए थे और मूर्ख ही मरेंगे। मूर्खता करना हमारा संवैधानिक अधिकार है। मूर्खता के अधिकार वंचित करने वाली सरकारों की हम मूर्ख समाज के सजग प्रहरी ईंट से ईंट बजा देंगे।

मध्य रात्रि में मंच पर पधारे हास्य कवि शंभू शिखर ने हास्य कविताओं से श्रोताओं को देर रात तक गुदगुदाया। उन्होंने सुनाया चीनी को जमा करके फिर से गन्ना बना दूं, हीरा जो तो उसको भी मैं पन्ना बना दूं..., खोल लेते दिल अगर यारों के साथ तो हमें ना खोलना पड़ता यूं औजारों के साथ..., भूत पिशाच चुड़ैल डाकिनी सब हैं साथ में आए, ज्ञानवापी में नंदी बाबा मंद-मंद मुस्काए, रंग ना हो तो भस्म से भर लो झोली रे...। 

उन्होंने एक से बढ़कर एक हास्य कविताओं के जरिए देर रात तक हास्य रस की फुहार से श्रोताओं को सराबोर कर दिया। महापौर अशोक तिवारी और विधायक सुशील सिंह ने आगंतुक कवियों को बेढंगी टोपियां पहनाकर स्वागत किया। शनिवार गोष्ठी के पूर्व अध्यक्ष जगदंबा तुलस्यान को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मंच सचालन दमदार बनारसी ने किया। 

कवियों में प्रशांत सिंह ने उल्लूओं सा सदा आचरण किजिए..., विभा सिंह ने मत जानिए ये प्यार मुहब्बत के फाग हैं..., उत्कर्ष उत्तम ने आता नहीं खेल फिर भी खेल रहा हूं..., नरकंकाल ने पब्जी खेल-खेल हुआ प्यार आ गई सीमा करके सीमा पार...और धर्मराज उपाध्याय ने नवंबर जस मजा जनवरी मां न पइहौ...सुनाया। 
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