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Varanasi: भारत और दुनिया के लिए असाधारण है जी-20 में जनभागीदारी, वाराणसी में विदेश मंत्री एस जयशंकर का बयान

Mon, 12 Jun 2023 09:42 AM IST
वाराणसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: वाराणसी ब्यूरो Updated Mon, 12 Jun 2023 09:42 AM IST
सार

G20 Summit in Varanasi: वाराणसी में केंद्रीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि  पहली बार जी-20 जनभागीदारी की तरह देखा जा रहा है। इससे पहले तक जिन देशों को जी-20 की अध्यक्षता मिली, वहां उस देश की राजधानी में ही आयोजन हुए थे।

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Public participation in G-20 is extraordinary for India and the world
वाराणसी में विदेश मंत्री एस जयशंकर और सीएम योगी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वाराणसी में केंद्रीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि भारत में होने वाला जी-20 सम्मेलन न सिर्फ हमारे लिए बल्कि दुनिया के लिए भी असाधारण है। पहली बार जी-20 जनभागीदारी की तरह देखा जा रहा है। इससे पहले तक जिन देशों को जी-20 की अध्यक्षता मिली, वहां उस देश की राजधानी में ही आयोजन हुए थे। यह जी-20 के इतिहास में पहली बार हुआ कि करीब 60 शहरों में इसके आयोजन हो रहे हैं। इसमें वाराणसी का जुड़ाव सबसे महत्वपूर्ण है। काशी में विकास मंत्रियों की बैठक है। काशी में सरकारें तय करेंगी कि दुनिया में आगे विकास कैसे होगा।

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विदेश मंत्री रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन सभागार में भारतीय विदेश नीति के उद्देश्यों और विशेषताओं पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जी-20 तो कई हो चुके हैं। मैं, ऐसे दस जी-20 में हिस्सा ले चुका। लेकिन, इस बार जनभागीदारी है।

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अगर पीएम मोदी नहीं होते तो जी-20 वाराणसी में होता क्या?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह निर्णय लिया कि जी-20 को हम एक उत्सव के रूप में मनाएंगे तो उनकी अपेक्षा थी कि हम दुनिया को अपने सांस्कृतिक केंद्रों तक ले जाएंगे। यह कोई सरकारी या अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं बल्कि उससे इतर है। जो मेहमान काशी समेत 60 शहरों में आएंगे और वापस जाएंगे तो उनके मन में भारत का एक चित्र होगा। वह हमारी संस्कृति को समझेंगे और जब जाएंगे तो भारत के राजदूत बनकर जाएंगे। दुनिया के सामने भारत की संस्कृति और परंपरा को रखेंगे। अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं हाेते तो जी-20 वाराणसी में होता क्या?

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जनता की चिंता करने वाली सरकार

विदेश मंत्री ने कहा कि पीएम मोदी देश के हर नागरिक का ख्याल रखते हैं। वह कहते हैं, देश का एक भी नागरिक अगर बाहर फंसा हुआ है तो उसकी हरसंभव मदद करनी है। सबको यह विश्वास होना चाहिए कि कुछ भी हो जाए भारत सरकार उन्हें बचाने जरूर जाएगी। यूक्रेन में फंसे विदेशी छात्रों को ऑपरेशन गंगा और सूडान में फंसे नागरिकों के लिए ऑपरेशन कावेरी चलाकर सरकार ने यह विश्वास कायम रखा। ये ऑपरेशन दर्शाता है कि हम अपनों की चिंता करते हैं।

आज दुनिया के किसी भी देश में भारतीय जाएं तो उनको यह भरोसा रहता है कि हमारे पीछे कोई है, जो हमारी चिंता करता है। हम अगर किसी परेशानी में हैं तो हमें मदद जरूर मिलेगी। प्रधानमंत्री का प्रयास है कि योग, आयुर्वेद और मोटा अनाज, आंदोलन की तरह पूरी दुनिया में पहुंच चुका है। जब देश का प्रधानमंत्री नागरिक के बारे में सोचने लगे, राष्ट्रवादी विचार हों, तो ऐसे ही बदलाव आते हैं। तकनीक और मिलजुलकर काम करने से ये बदलाव आया है।

पाकिस्तान और चीन के खिलाफ कठोर निर्णय लेना पड़ा

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वाराणसी के काशी विद्यापीठ में विदेश मंंत्री एस जयशंकर - फोटो : अमर उजाला

विदेश मंत्री ने कहा कि पापुआ गिनी के प्रधानमंत्री ने जिस तरह हमारे प्रधानमंत्री का स्वागत किया, ऐसा स्वागत और इस भाव से स्वागत मैंने 45वर्षों के इतिहास में कभी नहीं देखा। आज दुनिया को लगता है कि कोई भी संकट होगा तो भारत है, मोदी हैं। विदेश नीति के कारण पाकिस्तान और चीन के खिलाफ कठोर निर्णय लेना पड़ा।
काशी में बदलाव अकल्पनीय
विदेश मंत्री ने कहा कि काशी तमिल संगमम के दौरान काशी आने का अवसर मिला था। उस वक्त मैंने यही महसूस किया कि काशी में जो बदलाव हुआ, वह अकल्पनीय है। काशी से मेरा गहरा लगाव है। केंद्र सरकार के नौ साल गुजर चुके हैं और इन नौ वर्षों में हर क्षेत्र में बदलाव नजर आया है।

करवाएंगे पासपोर्ट में विलंब की जांच

छोटे शहरों में पासपोर्ट बनवाने में होने वाले विलंब का सवाल अनुज डिडवानिया ने उठाया तो केंद्रीय विदेश मंत्री ने कहा कि मैं हर महीने पासपोर्ट की पेंडिंग लिस्ट मंगवाता हूं। ऐसा नहीं होना चाहिए, मैं वापस जाकर इसकी जांच करवाता हूं। विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया में जब भी संकट होता है तो मोदी सरकार मदद के लिए कदम उठाती है। कोविड के दौरान देश के बाहर फंसे लोगों, श्रमिकों, विद्यार्थियों को वंदेभारत मिशन चलाकर वापस लाया गया। इस मिशन के दौरान 70 लाख नागरिक देश वापस आए। यूक्रेन से 20 हजार छात्रों को निकाला गया था।

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