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पं. कमलापति त्रिपाठी जयंती विशेष: पत्नी के निधन के बाद जीवन भर नहीं खाया आम, आज मनाई जाएगी 117वीं जयंती

Sat, 03 Sep 2022 09:44 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी/ चंदौली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी/ चंदौली Published by: किरन रौतेला Updated Sat, 03 Sep 2022 09:44 AM IST
सार

हिंदी भाषा के सेवक, मूर्धन्य संपादक, समर्पित स्वतंत्रता सेनानी पं. कमलापति त्रिपाठी की आज 117वीं जयंती है। पं. कमलापति त्रिपाठी ने काशी और चंदौली के विकास की नई इबारत लिखी। राष्ट्रीय राजनीति में कमलापति त्रिपाठी काशी की संस्कृति के ब्रांड एंबेसडर थे। 

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Pt. Kamalapati Tripathi Jayanti Special, 117th birth anniversary will be celebrated today in varanasi
पं.कमलापति त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिंदी भाषा के अनन्य सेवक, मूर्धन्य संपादक, समर्पित स्वतंत्रता सेनानी एवं यशस्वी राजनेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने काशी और चंदौली के विकास की नई इबारत लिखी। राष्ट्रीय राजनीति में कमलापति त्रिपाठी काशी की संस्कृति के ब्रांड एंबेसडर थे। उनकी 117वीं जयंती (03 सितंबर सन 1905 ) पर सतत प्रेरक स्मृतियां आज भी जीवंत हैं।

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राजीव गांधी स्टडी सर्किल के समन्वयक प्रो. सतीश राय ने बताया कि बेशक काशी के गौरव पं. कमलापति त्रिपाठी से न केवल कई पीढ़ी से मुझे पारिवारिक रिश्तों का संस्कार मिला था, बल्कि व्यक्तिगत शैक्षणिक स्वरूप में उनके सहायक के रूप में दशकों तक काम कर उनके व्यक्तित्व को गहराई से समझने का अवसर मिला था। वह एक समर्पित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। गांधी जी के सभी आंदोलनों में पांच बार जेल गए। जेल से आने पर बीमार पत्नी ने बातचीत में आम खाने की इच्छा प्रकट की थी, तो यह कहकर मना कर दिया था कि नुकसान करेगा।
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कुछ ही देर बाद अचानक वह चल बसी थीं। 29 साल में ही विधुर बने कमलापति जी ने दो संकल्प लिए कि जीवन में कभी आम नहीं खाऊंगा और दूसरा विवाह नहीं करूंगा। 54 वर्षों में दोनों संकल्पों को पूरी निष्ठा से जिया। वह धर्मनिष्ठा एवं धर्म निरपेक्षता दोनों की आदर्श मिसाल थे। गांधी दर्शन पर वह प्रशस्त लेखक थे, जिन्होंने अपने नेता पं. नेहरू की तर्ज पर ज्यादा ग्रंथ अपने जेल जीवन के बीच बिना किसी रेफरेंस लाइब्रेरी के सहयोग से लिखी थीं।
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गांधी जी के रचनात्मक आंदोलन के राष्ट्रीय शिक्षा कार्यक्रम के तहत बने विद्यापीठों में शामिल काशी विद्यापीठ के वह यशस्वी स्नातक ही नहीं, चांसलर भी रहे। विद्यापीठ को अधिनियमित विश्वविद्यालय बनाने की पहल, अपनी चांसलरशिप गंवाकर भी उन्होंने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में की।

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