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पं. दीनदयाल उपाध्याय जयंती: 283 पन्नों के फैसले में अदालत ने जांच पर उठाए थे सवाल, चोरी में सजा, हत्या में बरी

Fri, 25 Sep 2026 03:20 PM IST
Pragati Chand रवि प्रकाश सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।
रवि प्रकाश सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 25 Sep 2026 03:20 PM IST
सार

पं. दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमयी मौत के बाद 283 पन्नों के फैसले में अदालत ने जांच पर सवाल उठाए थे। चोरी और हत्या की आशंका में जीआरपी थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। 

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Pt. Deendayal Upadhyaya Jayanti 283-page verdict court raised questions about investigation in varanasi
पं. दीनदयाल उपाध्याय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पं. दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमयी मौत के 58 साल बाद भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। 283 पन्नों के फैसले में अदालत ने जांच पर सवाल उठाए थे। चोरी के मुकदमे में चार साल की सजा हुई थी जबकि हत्या के आरोप से दो को बरी कर दिया था। 11 फरवरी 1968 मुगलसराय (वर्तमान पं. दीनदयाल उपाध्याय नगर) में रेलवे ट्रैक पर उपाध्याय का शव मिला था। चोरी और हत्या की आशंका में जीआरपी थाने में प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया। वाराणसी की अदालत में सुनवाई चली और 9 जून 1969 को अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए आरोपी भरत को चोरी के आरोप में चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।

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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मुरलीधर के 283 पन्नों के फैसले में जांच की खामियों, रेलवे अधिकारियों की कथित लापरवाही और सीबीआई की जांच पर गंभीर टिप्पणियां की थीं। अभियोजन पक्ष की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता पीएन सिंह और पीके चौबे तथा बचाव पक्ष की ओर से चरणदास सेठ और मजाहिर हुसैन पैरवी की थी। मुगलसराय थाना क्षेत्र में हुई घटना में मुकदमा चोरी और हत्या के आरोप में भारतीय दंड संहिता के तहत चला था। 

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वरिष्ठ अधिवक्ता और लीगल मामलों पर रिसर्च करनेवाले नित्यानंद राय के मुताबिक मुकदमे की सुनवाई वाराणसी कचहरी के लाल भवन में हुई। नौ जून 1969 को फैसला सुनाते हुए अदालत ने रेलवे अधिकारियों और जीआरपी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे। फैसले के अंतिम हिस्से में न्यायाधीश मुरलीधर ने लिखा है कि मामले की शुरुआत से ही रेलवे और जीआरपी की लापरवाही तथा संलिप्तता के संदर्भ सामने आते हैं। 

अदालत ने सहायक रेलवे स्टेशन मास्टर बीएन प्रसाद के उस कथन का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने बताया था कि शंटिंग से पहले रात 2:20 बजे पोल के पास एक शव देखा गया था। अदालत ने सवाल उठाया कि शव मिलने के बाद यह संभावना क्यों नहीं जांची गई कि मृत व्यक्ति 52 डाउन ट्रेन का यात्री हो सकता है। फैसले में कहा गया कि ट्रेन प्लेटफॉर्म पर 35 मिनट तक खड़ी रही और एफसीटी बोगी लगभग 50 मिनट तक स्टेशन पर मौजूद थी। इसके बावजूद घटना की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।  
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टिकट और बोगी नंबर होने के बाद भी 4:45 घंटे तक पुलिस नहीं कर सकी पहचान
फैसले के अनुसार दरोगा फतेह बहादुर सिंह सुबह चार बजे घटनास्थल पर पहुंचे। मेडिकल परीक्षण के बाद सुबह 8:45 बजे तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पहचान के लिए कोई प्रभावी प्रयास नहीं किया गया, जब तक कि एसआई जगन्नाथ सिंह वहां नहीं पहुंचे। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि मृतक के पास यात्रा टिकट और आरक्षण टिकट मौजूद था। 52 डाउन ट्रेन के कंडक्टर गार्ड बीडी कमल और प्रथम श्रेणी के कोच अटेंडेंट पदम सिंह की मौजूदगी का भी फैसले में जिक्र किया गया। फैसले में कहा गया कि पुलिस अधिकारी को कम से कम यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि शव जिस मूल स्थिति में मिला था, उसी अवस्था में उसका फोटोग्राफ लिया जाता।
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1967 में पं. दीनदयाल उपाध्याय चुने गए थे अध्यक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता मंगलेश दूबे ने बताया कि दिसंबर 1967 में पं. दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया था। इससे पहले वह कई वर्षों तक पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव के रूप में कार्य कर चुके थे। 1967 के आम चुनावों में जनसंघ को महत्वपूर्ण सफलता मिली थी और वह राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में उभर रहा था। पं. दीनदयाल उपाध्याय की मौत के बाद मामले की जांच और अदालत के फैसले को लेकर लंबे समय तक चर्चा होती रही। बाद में केंद्र सरकार ने घटना की परिस्थितियों की जांच के लिए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था।
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