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देव प्रबोधिनी एकादशी: आज रात्रि जागरण करने से होगी श्रेष्ठ फल की प्राप्ति
टीम डिजिटल,वाराणसी/गाजीपुर
Updated Tue, 31 Oct 2017 02:47 PM IST
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प्रबोधिनी एकादशी व्रत से विष्णु धाम की होती है प्राप्ति
- फोटो : demo
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नारद पुराण के अनुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह व्रत आज मनाया जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन उपवास करके रात में सोए हुए भगवान को गीत आदि मांगलिक उत्सवों के द्वारा जगाने का विधान है। ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर जातक को परम लोक प्राप्ति का वरदान देते हैं।
पर्व के बारे में बताते हुए ज्योतिष शिरोमणि डा. शैलेश मोदनवाल कहते हैं कि चार महीने शयन के बाद एकादशी की रात्रि को भगवान विष्णु अपने योग निद्रा से जागते हैं। नारद पुराण के उत्तर भाग में एकादशी व्रत महात्म्य के विषय में कहा गया है कि एकादशी से अधिक पवित्र न गंगा है, न गया है, न काशी है, न पुष्कर। कुरुक्षेत्र, नर्मदा, देविका, यमुना तथा चंद्रभाग भी एकादशी से बढ़कर पुण्यमय नहीं हैं।
पं. जितेंद्र शुक्ल के अनुसार एकादशी व्रत करने वाला पुरुष मातृकुल, पितृकुल तथा पत्नीकुल की दस-दस पीढिय़ों का उद्धार कर देता है। एकादशी व्रत स्वर्ग और मोक्ष को देने वाला है। एकादशी व्रत को करने वाला सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।
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डॉ. टीपी त्रिपाठी के अनुसार पर्व के दिन चारों वेदों के विविध मन्त्रों तथा वाद्य यन्त्रों के द्वारा भगवान लक्ष्मी पति को जगाना चाहिए। द्राक्षा, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा आदि वस्तुएं भगवान को अर्पित करनी चाहिए।
रात्रि बीतने के पश्चात दूसरे दिन भगवान श्रीमन्नारायण की पुरूष सूक्त के मन्त्रों के द्वारा षोड्शोपचार विधि से पूजा कर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। इस प्रकार विधान से इस व्रत का पालन करने पर श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
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पर्व के बारे में बताते हुए ज्योतिष शिरोमणि डा. शैलेश मोदनवाल कहते हैं कि चार महीने शयन के बाद एकादशी की रात्रि को भगवान विष्णु अपने योग निद्रा से जागते हैं। नारद पुराण के उत्तर भाग में एकादशी व्रत महात्म्य के विषय में कहा गया है कि एकादशी से अधिक पवित्र न गंगा है, न गया है, न काशी है, न पुष्कर। कुरुक्षेत्र, नर्मदा, देविका, यमुना तथा चंद्रभाग भी एकादशी से बढ़कर पुण्यमय नहीं हैं।
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पं. जितेंद्र शुक्ल के अनुसार एकादशी व्रत करने वाला पुरुष मातृकुल, पितृकुल तथा पत्नीकुल की दस-दस पीढिय़ों का उद्धार कर देता है। एकादशी व्रत स्वर्ग और मोक्ष को देने वाला है। एकादशी व्रत को करने वाला सब पापों से मुक्त हो भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त करता है।
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डॉ. टीपी त्रिपाठी के अनुसार पर्व के दिन चारों वेदों के विविध मन्त्रों तथा वाद्य यन्त्रों के द्वारा भगवान लक्ष्मी पति को जगाना चाहिए। द्राक्षा, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा आदि वस्तुएं भगवान को अर्पित करनी चाहिए।
रात्रि बीतने के पश्चात दूसरे दिन भगवान श्रीमन्नारायण की पुरूष सूक्त के मन्त्रों के द्वारा षोड्शोपचार विधि से पूजा कर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। इस प्रकार विधान से इस व्रत का पालन करने पर श्रेष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
प्रबोधिनी एकादशी का पौराणिक महत्व
vishnu ji
पं. मुरारी श्याम पांडेय का कहना है कि वैसे तो सभी एकादशी व्रत महत्वपूर्ण है, लेकिन उनमें से प्रबोधिनी एकादशी विशेष है। इस व्रत में रात्रि जागरण व भगवन्नामजप का विषेश महात्म्य है।
यदि श्रद्धा और भक्ति के साथ उक्त व्रत पारायण किया जाए, तो सहस्त्रों अश्वमेधयज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञों के फलों की प्राप्ति हो जाती है। इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि जहां भगवान के लिए जागरण किया जाता है, वहां काशी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य, शालिग्राम मथुरा आदि सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं।
चारो वेद समस्त यज्ञ श्रीहरि के निमित्त किए जाने वाले जागरण के स्थान पर उपस्थित होते है। गंगा, सरस्वती, तापी, जमुना सतलज आदि नदियां भी वहां उपस्थित होती हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन रात्रि जागरण से मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों का शमन हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान की कथा सुनने वाले भक्तों को सौ गोदान का फल प्राप्त होता है।
यदि श्रद्धा और भक्ति के साथ उक्त व्रत पारायण किया जाए, तो सहस्त्रों अश्वमेधयज्ञ और सैकड़ों राजसूय यज्ञों के फलों की प्राप्ति हो जाती है। इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। ऐसा कहा जाता है कि जहां भगवान के लिए जागरण किया जाता है, वहां काशी, पुष्कर, प्रयाग, नैमिषारण्य, शालिग्राम मथुरा आदि सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं।
चारो वेद समस्त यज्ञ श्रीहरि के निमित्त किए जाने वाले जागरण के स्थान पर उपस्थित होते है। गंगा, सरस्वती, तापी, जमुना सतलज आदि नदियां भी वहां उपस्थित होती हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन रात्रि जागरण से मनुष्य के समस्त प्रकार के पापों का शमन हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान की कथा सुनने वाले भक्तों को सौ गोदान का फल प्राप्त होता है।
काशी में आज अलग किस्म का उत्सव
डुबकी
- फोटो : अमर उजाला
काशी में मंगलवार को एक अलग किस्म का उत्सव होगा। क्षीर सागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु भक्तों के कल्याण के लिए जागेंगे। गंगा तटों से लेकर घर-घर तक तुलसी महारानी का विवाह भगवान विष्णु के साथ रचाया जाएगा। इसके लिए गंगा तटों पर जगह-जगह मंडप सजाए जाएंगे। पंचगंगा घाट पर भव्य समारोह में भगवान हरि के साथ तुलसी का विवाह होगा।
चार महीने से क्षीर सागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु के जागने के साथ ही शुभ कार्यों की घड़ियां आ जाएंगी। महीने भर से गंगा तटों पर हरि को प्रसन्न करने में जुटीं महिलाएं उत्सव मनाएंगी।
तुलसी विवाह की छटा देखते बनेगी। श्रीमठ में बधाई बजेगी। बारात निकलेगी और भगवान विष्णु के साथ तुलसी का विवाह रचाया जाएगा। शीतला घाट, दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और तुलसी घाट के अलावा हनुमान घाट पर तुलसी विवाह के लिए मंडप सजेंगे। इसके लिए सोमवार को गन्ने की खरीद के लिए बाजार में भीड़ लगी रही।
चार महीने से क्षीर सागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु के जागने के साथ ही शुभ कार्यों की घड़ियां आ जाएंगी। महीने भर से गंगा तटों पर हरि को प्रसन्न करने में जुटीं महिलाएं उत्सव मनाएंगी।
तुलसी विवाह की छटा देखते बनेगी। श्रीमठ में बधाई बजेगी। बारात निकलेगी और भगवान विष्णु के साथ तुलसी का विवाह रचाया जाएगा। शीतला घाट, दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और तुलसी घाट के अलावा हनुमान घाट पर तुलसी विवाह के लिए मंडप सजेंगे। इसके लिए सोमवार को गन्ने की खरीद के लिए बाजार में भीड़ लगी रही।