काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर लोकार्पण : मोदी देंगे सांस्कृतिक सरोकारों पर संकल्प से सिद्धि का संदेश
अयोध्या के साथ काशी को भी हिंदुत्व का ‘ब्रांड अंबेसडर’ बनाने की तैयारी। प्रतीकों के सहारे राजनीतिक मुद्दों को परवान चढ़ाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के माहिर मोदी इसके जरिये संघ परिवार को भाजपा के लिए भविष्य के समीकरण साधने का मौका भी देंगे।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार 13 दिसंबर को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के जरिये हिंदुत्व के सांस्कृतिक सरोकारों पर अपनी सरकार के समर्पण और आस्था पर संकल्पों को सिद्धि तक पहुंचाने का संदेश तो देंगे। साथ ही प्रतीकों के सहारे राजनीतिक मुद्दों को परवान चढ़ाकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के माहिर मोदी इसके जरिये संघ परिवार को भाजपा के लिए भविष्य के समीकरण साधने का मौका भी देंगे। वे विपक्ष के साथ पक्ष को भी इस बात का एहसास कराने की कोशिश करेंगे कि कोई उन पर कितना भी कड़ा और बड़ा हमला बोले लेकिन वे हिंदुत्व के एजेंडे पर टस से मस नहीं होने वाले।
सोमवार को हो रहे काशी-विश्वनाथ धाम कारिडोर के लोकार्पण कार्यक्रम को जिस तरह उत्सव का रूप देने की तैयारी की गई है और जिन लोगों को बुलाया गया है, उसको देखते काशी के जरिये दूरगामी संदेश देने की तैयारी साफ नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि अयोध्या के बाद काशी को भी संघ परिवार ने हिंदुत्व या राष्ट्रवाद का ‘ब्रांड अंबेसडर’ बनाने की तैयारी कर ली है।
ऐसा लगता है कि संघ परिवार ने इस काशी के काम जरिये हिंदुत्व के सरोकारों और आस्था के साथ गैर भाजपा सरकारों की तरफ से किए गए अपमानजनक व्यवहार को पूरे देश में घर-घर पहुंचाकर इसे मुद्दा बनाने की तैयारी कर ली है। इस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने काशी में तीन दिन रहकर काशी के इस बदलाव को हर हिंदू परिवार तक पहुंचाने का खाका खींचा है।
साथ ही भाजपा ने भी जिस तरह इस लोकार्पण कार्यक्रम को संगठनात्मक रूप से गठित सभी शक्ति केंद्रों पर बड़ी स्क्रीन लगाकर दिखाने के साथ अन्य प्रमुख मठ-मंदिरों में भी इसके सजीव प्रसारण की व्यवस्था कराई है। उससे यह साफ नजर आता है कि संघ परिवार ने ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ के लोकार्पण के जरिये मोदी और भाजपा सरकार के आस्था पर समर्पण व दृढ़ संकल्प तथा हिंदू संस्कृति के प्रतीकों पर प्रहार के प्रति उत्तर के लिए विध्वंस का जवाब निर्माण से देने की नीति का संदेश घर-घर पहुंचाने की तैयारी कर ली है।
जिस तरह इस लोकार्पण समारोह का साक्षी बनने के लिए देश के भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उप मुख्यमंत्रियों तथा गठबंधन की सरकारों वाले राज्यों में बतौर उप मुख्यमंत्री जिम्मेदारी निभाने वाले भाजपा नेताओं को काशी बुलाया गया है, उससे भी इस लोकार्पण के जरिये भाजपा सहित पूरे संघ परिवार की दूरगामी रणनीति को समझा सकता है।
जाहिर है कि इस समारोह का साक्षी बनने वाले 11 मुख्यमंत्री और 9 उपमुख्यमंत्री इस कार्यक्रम के सिर्फ गवाह नहीं होंगे, बल्कि हिंदुत्व की सांस्कृतिक चेतना को नई धार देने के संदेश के भी देश भर में संवाहक होंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह इन सभी को काशी के बाद अयोध्या ले जाकर वहां निर्माणाधीन रामलला की जन्मभूमि पर बन रहे भव्य मंदिर का निर्माण दिखाने तथा रामलला के दर्शन व पूजन का कार्यक्रम भी तय किया है, उससे साफ है कि 2022 में अयोध्या और काशी के बदलाव को केसरिया रंग को और गाढ़ा करने में काम लिया जाएगा।
हालांकि कई ऐसे लोग भी हैं, जो भाजपा के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ाने के अभियान का हिस्सा मान रहे हैं। यह सही है कि इससे केंद्र एवं प्रदेश सरकार के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन बढ़ाने के संकल्प को मजबूती मिलेगी। पर, संघ परिवार और भाजपा ने सिर्फ इतने भर के लिए यह तैयारी नहीं की है। दरअसल, काशी का इतिहास भारतीय संस्कृति के समृद्धि का इतिहास है। समृद्ध भारतीय परंपरा का इतिहास है। यह 11वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी के बीच भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिह्नों के विध्वंस और उसके पुनर्निर्माण के संघर्ष की कहानी है।
मान्यता के अनुसार, खुद भगवान शिव के मां पार्वती के साथ पृथ्वी पर सर्वप्रथम यहीं आकर शिवलिंग के रूप में स्थापित होने के कारण इसे द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। आदि शंकराचार्य, रानी अहिल्याबाई होल्कर, संत रविदास, संत कबीर, भगवान बुद्ध के कृतित्व व व्यक्तित्व से प्रेरित काशी प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास’ को जीती है । इसमें यदि सोमनाथ के विध्वंस और उसके पुनर्निर्माण के साथ काशी विश्वनाथ के विध्वंस और पुनर्निर्माण की गाथा जोड़़ दी जाए तो अपने आप पूरे देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश चला जाता है ।
काशी विश्वनाथ धाम का कॉरिडोर का निर्माण अपने साथ कई संदेश छिपाए है । संदेश विध्वंस के खिलाफ निर्माण का , संहार के खिलाफ सृजन का । चूंकि शिव अपने भीतर एक साथ संहार और सृजन का तत्व छिपाए माने जाते हैं तो जाहिर है कि इस कॉरिडोर के लोकार्पण के सहारे किसी न किसी रूप में प्रधानमंत्री तुष्टीकरण की नीति पर प्रहार कर विरोधी राजनीतिक दलों की शक्ति कमजोर करने की भी कोशिश करेंगे। साफ है कि यह लोकार्पण प्रधानमंत्री के भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिह्नों पर हुए विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण से इनकी गरिमा और गौरव पर लगी चोट के चिह्नों को साफ करने तथा हिंदू संस्कृति के गौरव से जुड़े स्थलों को उनका पुराना स्वरूप और सरोकार लौटाने के लिए कृत संकल्प होने का संदेश देने की तैयारी है।
इस बहाने वह गैर भाजपा सरकारों के चाल, चरित्र और चिंतन भी हमला बोल सकते हैं। ध्यान रखना होगा कि काशी को देश की सांस्कृतिक राजधानी ही नहीं कहा जाता बल्कि यहां लघु भारत बसता है। देश के ज्यादातर राज्यों के रहने वालों के मोहल्ले इस नगरी में हैं। विदेशी सैलानियों का भी यहां आना जाना ज्यादा रहता है । समझा जा सकता है कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के जरिये भारतीय संस्कृति को सहेजने, संवारने और उसे सम्मान देने का संदेश सिर्फ देश के भीतर ही नहीं बल्कि विदेश तक पहुंचाने की तैयारी है ।