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रिश्तों से परे भी निभा रहे हैं तर्पण की परंपरा: सात समंदर पार से आई रति ने काशी में करवाया त्रिपिंडी श्राद्ध

Sat, 07 Oct 2023 03:09 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Sat, 07 Oct 2023 03:09 PM IST
सार

सात समंदर पार से आईं रति कुमारी ने शुक्रवार को पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धाकर्म करवाई। वह अपने पुरखों की आत्मा की तृप्ति और परिवार में शांति के लिए प्रार्थना कीं। दो कर्मकांडियों ने उनका विधिवत त्रिपिंडी श्राद्ध करवाया। ऐसे कई महिलाओं ने भी श्राद्धकर्म कर खुद श्राद्धकर्म करवाया।

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pitru paksh 2023 Rati, who came from across the seven seas, performed Tripindi Shraddha in Kashi.
पितृपक्ष के मौके पर अपने पितरों का श्राद्ध करतीं ऑस्ट्रेलिया से आई रति कुमारी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बात जब मोक्ष की हो तो काशी गया की मान्यता वाली शिव की नगरी में पितरों के तर्पण का अलग ही विधान है। पिशाचमोचन पर त्रिपिंडी श्राद्ध होता है तो वहीं घाटों पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो रिश्तों से परे मोक्ष की इस परंपरा को अनवरत निभा रहे हैं। वहीं महिलाएं भी पुरखों के श्राद्ध और तर्पण के लिए बनारस पहुंच रही हैं। पितृपक्ष के मातृ नवमी को मातृशक्ति को समर्पित श्राद्ध और तर्पण के अनुष्ठान संपन्न होते हैं। शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि मातृ नवमी को मातृशक्ति का श्राद्ध करने से उनको मुक्ति मिलती है।

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82 हजार अजन्मी बेटियों के मानस पिता हैं संतोष

आगमन संस्था के डॉ. संतोष ओझा इस बार मातृ नवमी पर 15 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध करके वह 82 हजार अजन्मी बेटियों के मानस पिता बन जाएंगे। पिछले 9 वर्षों में 67 हजार अजन्मी बेटियों के लिए सविधिक मोक्ष अनुष्ठान हो चुका है। डॉ. संतोष ने बताया कि 2001 में वह आगमन टीम के साथ एड्स के खिलाफ जनजागरूकता अभियान चला रहे थे। इसी दौरान एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई जिसने बेटे की चाह में अपनी पत्नी के गर्भ में ही अपनी बेटी की हत्या कर दी थी। इसके बाद यह घटना मेरे दिमाग में चलती रही और 10 साल पहले मन में विचार आया कि जब पेट में पल रही बेटियों को किन्हीं कारणों से बचाने में सफल नहीं हो पाया तो कम से कम उनके मोक्ष के लिए कामना तो की जा सकती है। इसके साथ ही बेटियों के मोक्ष के लिए अंतिम प्रणाम का दिव्य अनुष्ठान आरंभ हो गया। शुरू में काशी के विद्वान इस अनुष्ठान पर एकमत नहीं थे। लिहाजा श्रेष्ठ विद्वानों से मिलकर शास्त्र सम्मत बातों का अध्ययन जैसे तैसे परिजनों कि रजामंदी के बाद अनुष्ठान को दशाश्वमेध घाट पर प्रारंभ किया गया।

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पितृ पक्ष - फोटो : अमर उजाला

लावारिसों के अंतिम संस्कार के बाद अब कर रहे हैं तर्पण

वाराणसी। एक तरफ जहां लोग खून के रिश्तों से जीते जी मुंह मोड़ लेते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के बाद भी उनके पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया को पूरा कर रहे हैं। अमन कबीर और मोनू बाबा ने कोरोना काल के अलावा अब तब जितने भी शवों का अंतिम संस्कार किया है पितृपक्ष में वह उनको नियमित श्राद्ध व तर्पण कर रहे हैं। अमन ने बताया कि रोजाना उनको दो से चार लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने का मौका मिलता है। पिछले 5 साल से दोनों यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अब तक पांच सौ से अधिक लावारिस शवों को मुखाग्नि दे चुके हैं और उनका तर्पण भी नियमित कर रहे हैं। ---

सात समंदर पार से आई रति ने काशी में करवाया त्रिपिंडी श्राद्ध

सात समंदर पार से आईं रति कुमारी ने शुक्रवार को पिशाचमोचन कुंड पर श्रद्धाकर्म करवाई। वह अपने पुरखों की आत्मा की तृप्ति और परिवार में शांति के लिए प्रार्थना कीं। दो कर्मकांडियों ने उनका विधिवत त्रिपिंडी श्राद्ध करवाया। ऐसे कई महिलाओं ने भी श्राद्धकर्म कर खुद श्राद्धकर्म करवाया।

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बनारस में हुआ श्राद्ध - फोटो : अमर उजाला

आस्ट्रेलिया में आईटी क्षेत्र की एक कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर रति के भाई नहीं है। सिर्फ पांच बहन ही हैं। वह सबसे छोटी और अविवाहित हैं। जज रहे पिता जगदीश कुुमार का कोरोनाकाल में निधन हो गया। रति आस्ट्रेलिया से दिल्ली और फिर शुक्रवार को काशी पहुंचीं। उन्होंने बताया कि परिवार के सभी पितरों के साथ अपनी तीन बुआ का भी श्राद्धकर्म करवाया है। मैं शांति महसूस कर रही हूं। झारखंड के पलामू जिले के अंकित गोस्वामी ने पत्नी कनक के साथ, मुनारी की आराधना सिंह ने त्रिपिंडी श्राद्धकर्म किया। छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले की उत्री देवी और बांदा की सावित्री देवी ने अपने पति के साथ गया श्राद्ध करवाया। वहीं, प्रयागराज के हंडिया की सावित्री और मंजू ने अपने पुरखों का पिंडदान करवाया। ऐसे ही सुबह से रात तक पुरुषों के अलावा महिलाएं भी श्राद्धकर्म करवा रही हैं।

रोज 3 से 4 सौ महिलाएं कर रही हैं श्राद्धकर्म

तीर्थ पुरोहित संजीव तिवारी और पं. अभिषेक पुरी बताया कि रोज ही डेढ़ से दो लाख लोग पहुंच रहे हैं। प्रतिदिन 60 से 70 प्रतिशत त्रिपींडी श्राद्ध हो रहा है। बाकी गया श्राद्ध, पिंडदान आदि होता है। श्राद्धकर्म के लिए ज्यादातर कर्मकांडी बाहर से ही आ रहे हैं। तीर्थ पुरोहित पं. मुन्ना पांडेय ने बताया कि राजा दशरथ को मुक्ति सीता जी के श्राद्धकर्म से ही मिला। गरुण पुराण में वर्णित है कि पिता के पुत्र नहीं होने पर उनकी बेटी या पत्नी श्राद्धकर्म कर सकती हैं।

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