पर्यूषण पर्वः गर्भ कल्याणक पर दीयों से रौशन हुई भगवान सुपार्श्वनाथ की जन्मस्थली, महामस्तकाभिषेक का आयोजन
भगवान सुपार्श्वनाथ की जन्मस्थली स्थित श्री भदैनी जी दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र में समाज के लोगों ने गर्भ कल्याणक दिवस को हर्ष व उल्लास के साथ मनाया। संपूर्ण विश्व से कोरोना महामारी के खात्मे की कामना की गई।
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जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर 1008 भगवान सुपार्श्वनाथ का गर्भ कल्याणक दिवस रविवार को मनाया गया। भगवान सुपार्श्वनाथ की जन्मस्थली स्थित श्री भदैनी जी दिगंबर जैन तीर्थ क्षेत्र में समाज के लोगों ने उत्सव को हर्ष व उल्लास के साथ मनाया। पूजापाठ के साथ ही भगवान का महामस्तकाभिषेक किया गया। मंदिर प्रांगण जैन धर्म के संदेशों से गुंजायमान होते रहे।
रविवार को भगवान सुपार्श्वनाथ महामस्तकाभिषेक के बाद पंचामृत अभिषेक किया गया। इसके बाद संपूर्ण विश्व से कोरोना महामारी के खात्मे की कामना की गई। महामारी के खात्मे और सर्व जीवों की रक्षा के लिए वृहद शांति धारा की गई। इसके पश्चात शांतिनाथ विधान और भगवान पूजन पाठ संपन्न हुए। इस दौरान प्रभु दास जैन घाट पर विराजित भगवान पार्श्वनाथ के चरणों का अभिषेक हुआ।
शाम को मंदिर में दीप अर्चना की गई। मंदिर परिसर को दीपों से सजाकर प्रभु चरणों में अर्पित किया गया। दीप अर्चना में चौबीस भगवान के स्त्रोत पढ़कर दीप प्रज्वलित मंत्रों के साथ महामारी मुक्ति की कामना की गई। इसके बाद 24 भगवान की आरती उतारी उतारी गई। कार्यक्रम का आयोजन सुरेंद्र जैन की देखरेख में संपन्न हुए।
मुनि विशद सागर महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म का दिया ज्ञान
जैन मुनि 108 विशद सागर महाराज ने कहा कि हम सभी को सरल स्वभाव रखना चाहिए, कपट का त्याग करना चाहिए। कपट के भ्रम में जीना दुखी होने का मूल कारण है। आत्मा ज्ञान, खुशी, प्रयास और विश्वास जैसे असंख्य गुणों से सिंचित है। सीधा-सादा सरल होना ही सहजता है और सहजता ही जीवन में आ जाना ही सरलता है।
वह रविवार को पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन जैन मंदिर भेलूपुर में प्रवचन कर रहे थे। जैन मुनि ने कहा कि जो मनुष्य अपने मन से कपट करना, धोखा देना, चोरी करना के भाव को निकाल देता है व अपने स्वभाव को सरल व विनय से युक्त बना लेता है, उसे ही उत्तम आर्जव धर्म कहते हैं। कपटी व्यक्ति स्वयं अपने को धोखा देता है, वह दूसरे की अपेक्षा स्वयं से अपनी ही हानि अधिक करता है। मनुष्य अगर छल करके लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है तो वह लक्ष्मी शाश्वत नहीं रह पाती हैं, नष्ट हो जाती हैं।