Pandit Chhannulal Mishra: शास्त्रीय संगीत में साधारणता की आवाज, पिताजी ने खरीदा था दस रुपये का हारमोनियम
जब दाल खत्म हो जाती थी, तो रोटी, नमक और इमली की चटनी खाकर रियाज करने में गला बैठ जाता था। पर सोच यही रही कि खाना नहीं मिलेगा, तो गाएंगे क्या? पढ़ें- काशी की नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ला की रिपोर्ट...
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पंडित छन्नूलाल मिश्र साधारण की आवाज थे। अपनी गायकी में उन्होंने सरलता को मुहावरा बना लिया और उनके प्रशंसक कभी कमजोर नहीं पड़े। उनकी कला की तस्वीर कुछ-कुछ शिव जी की बारात जैसी थी- सुंदरता और अघोरीपन, शास्त्रीयता और जनप्रियता, मनोहर और भयंकर के अनोखे सामंजस्य में घटित होने वाली एक विलक्षण शोभायात्रा। छन्नूलाल जी को बनारस उपहार या विरासत में नहीं मिला।
वह आजमगढ़ से मुजफ्फरपुर होते हुए यहां पहुंचे और इस महान सभ्यता के विभिन्न रूपों का आलिंगन कर लिया। बीमार होने के पहले तक उनकी दिनचर्या अनूठी थी। सुबह साढ़े चार बजे उठना। बाबा कीनाराम के बनाए पड़ोस के साढ़े चार सौ बरस पुराने गैबेश्वर मंदिर में आधे घंटे टहलना। उसके बाद घर आकर पौन घंटे व्यायाम-प्राणायाम। फिर स्नान, जलपान और शिष्यों को सिखाने का क्रम। सुबह का सिखाना अच्छा माना गया है। रविवार को कुछ शिष्य बाहर से—कोलकाता, मुंबई और दिल्ली तक से—सीखने आ जाते थे।
पंडित जी कहा करते थे
‘अब कोई ख्वाहिश नहीं। इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, हमने सारी उमर गुजारी है अपने गाने में।’ आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गांव में तीन अगस्त की भोर में उनका जन्म हुआ। पंडित जी- तीन भाई और एक बहन। गीत में छन्नूलाल जी, वाद्य में भाई विश्वनाथ और नृत्य में सबसे छोटे शिव जी—बिरजू महाराज के शिष्य। उनका घर सात पीढ़ियों से संगीतकारों का घर है।
सबसे पहले वागीश्वरी महाराज। फिर पिंगल महाराज। उनके भतीजे पंडित जगदीप महाराज-जो बनारस में ठुमरी लाए। उनके लड़के-पंडित छन्नूलाल के दादा शीतल प्रसाद उर्फ ढोलई। ढोलई के लड़के—छन्नू जी के पिताजी—बद्री महाराज। उनके लड़के पंडित जी और उनके पुत्र रामकुमार मिश्र-यशस्वी तबलावादक।
रामकुमार का बेटा भी बहुत अच्छा तबला बजा रहा है। पंडितजी की बेटियां भी गाती रही हैं। पिता जी मुजफ्फरपुर से कमाकर महीने में दस रुपये भेजते थे, जिसमें बारह लोग पंद्रह दिन खाते थे। सस्ती का दौर था। रुपये में बारह किलो चावल। पैसा खत्म हो जाए, तो दाल कहां से आए? तब पेड़ पर ढेले मारकर इमली तोड़ लाते थे। रोटी, नमक और इमली की चटनी खाकर रियाज करते थे। मन में सोचते थे : ‘छोड़ेंगे नहीं रियाज’।
शुरू के पांच साल पिता जी ने रियाज कराया। दस रुपये का एक हारमोनियम उन्होंने खरीदकर दिया था। भोर में पांच बजे रियाज शुरू हो जाता था। जरा-सी भी झपकी आई कि पिताजी की एक चपत। कहते थे, ‘सो रहे हो, तो नाम कैसे होगा?’ पिता जी बहुत अच्छा तबला बजाते थे और गाना भी गाते थे।
माता जी ने ही सुंदरकांड का पाठ करना सिखाया। पंडित जी कहा करते थे
‘हनुमान जी बड़े कृपालु हैं-‘ज्ञानिनामग्रगण्यम’-ज्ञानियों में सबसे आगे। और तो और, संगीत में भी उनका एक मत है–हनुमान मत। शिव मत, नारद मत, भरत मत और हनुमान मत—ये चार मत हैं।’ तो, बचपन में चटनी खाकर रियाज करने में गला बैठ जाता था। एक बात यह भी रही होगी कि खाना नहीं मिलेगा, तो गाएंगे क्या? लेकिन गाते रहना था। पिता-गुरु का आशीर्वाद साथ में था। पंडित जी के पास लय का भयंकर अभ्यास था। एक ही ख्याल को तीन अलग-अलग तालों में गाना होता था।
विलंबित एक ताल यानी बारह मात्रा, झूमरा यानी चौदह मात्रा और तिलवाड़ा यानी सोलह मात्रा में। अलग-अलग लयों का अंदाज जरूरी था। ये पूरावक्ती काम भला माता-पिता के और कौन करता-करवाता! सच में उन पर काशीपुराधिपति महादेव, गंगा जी, संकटमोचन महाराज और गोस्वामी तुलसीदास का असीम आशीष था।