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दर्द और जख्मों को भूल लय में लौटी काशी
ब्यूरो/अमर उजाला, ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2015 02:13 AM IST
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यकीन जीता और साजिश हार गई। आशंकाओं के सारे बादलों को काटते हुए एक बार फिर से काशी अपनी पुरानी लय में लौट आई। घंटे-घड़ियाल की अनुगूंज के बीच सुबह-ए-बनारस का इस्तकबाल रोज की तरह गंगा आरती से हुआ। सोमवार को दोपहर बाद काशी की आत्मा पर जो चोट लगी थी, उसे भूलकर कुछ घंटों बाद ही शहर चल पड़ा अपनी धुन में। हालांकि हिंसा, आगजनी और पथराव के निशान सड़कों-गलियों में जहां-तहां नजर जरूर आए लेकिन शहर में आया हर अंजान शख्स इससे अंजान ही रहा कि एक दिन पहले यहां कुछ अनिष्ट हुआ था।
सोमवार को साधु संतों की निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा के दौरान हुए हिंसक बवाल के बाद हर मन आशंकित था। क्या शहर की आबोहवा फिर से अपनी पुरानी पटरी लौटेगी और लौटेगी भी तो कब तक? लेकिन, सारी आशंकाएं दरकिनार करते हुए मंगलवार को सूरज की पहली किरण के साथ काशी का दिल गोदौलिया विजेता की तरह खड़ा नजर आया। सुबह जब हुई तो यूं लगा ही नहीं कि कहीं कुछ हुआ था। गंगा आरती देखने को लोग वैसे ही काशी के घाटों पर जुटे। रोजाना की तरह ही
परदेसी सैलानी, मंदिरों की ओर बढ़ते दर्शनार्थी, सब नजर आए। बेनियाबाग चौराहे पर चाय की दुकान पर शाहिद, नईम और मुश्ताक भाई की वैसी ही अड़ी लगी थी। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, बाजार का रंग चटख होता गया। दूकानों पर खरीदारों की भीड़, मोलभाव करती महिलाएं। नई सड़क से लेकर दालमंडी और गोदौलिया, सब कुछ रोजाना जैसा ही। जहां एक दिन पहले पत्थर, लाठी चले, आग की
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लपटें उठीं, वहां ठंडई, मिश्रांबु और चाट-गोलगप्पों की दुकानें पहले की तरह सजी थीं। नई सड़क से गिरजाघर, मैदागिन से चौक, गोदौलिया से लक्सा, मदनपुरा से रेवड़ी तालाब, पूरी काशी जीवंत नजर आई। हां, सड़कों-गलियों में उपद्रव की कालिख, और यहां-वहां तैनात पुलिस फोर्स, आरएएफ जवानों के बूटों की धमक यह इशारा जरूर कर रही थी कि कहीं कुछ हुआ है।
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सोमवार को साधु संतों की निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा के दौरान हुए हिंसक बवाल के बाद हर मन आशंकित था। क्या शहर की आबोहवा फिर से अपनी पुरानी पटरी लौटेगी और लौटेगी भी तो कब तक? लेकिन, सारी आशंकाएं दरकिनार करते हुए मंगलवार को सूरज की पहली किरण के साथ काशी का दिल गोदौलिया विजेता की तरह खड़ा नजर आया। सुबह जब हुई तो यूं लगा ही नहीं कि कहीं कुछ हुआ था। गंगा आरती देखने को लोग वैसे ही काशी के घाटों पर जुटे। रोजाना की तरह ही
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परदेसी सैलानी, मंदिरों की ओर बढ़ते दर्शनार्थी, सब नजर आए। बेनियाबाग चौराहे पर चाय की दुकान पर शाहिद, नईम और मुश्ताक भाई की वैसी ही अड़ी लगी थी। जैसे-जैसे दिन चढ़ा, बाजार का रंग चटख होता गया। दूकानों पर खरीदारों की भीड़, मोलभाव करती महिलाएं। नई सड़क से लेकर दालमंडी और गोदौलिया, सब कुछ रोजाना जैसा ही। जहां एक दिन पहले पत्थर, लाठी चले, आग की
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लपटें उठीं, वहां ठंडई, मिश्रांबु और चाट-गोलगप्पों की दुकानें पहले की तरह सजी थीं। नई सड़क से गिरजाघर, मैदागिन से चौक, गोदौलिया से लक्सा, मदनपुरा से रेवड़ी तालाब, पूरी काशी जीवंत नजर आई। हां, सड़कों-गलियों में उपद्रव की कालिख, और यहां-वहां तैनात पुलिस फोर्स, आरएएफ जवानों के बूटों की धमक यह इशारा जरूर कर रही थी कि कहीं कुछ हुआ है।