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ई-वेस्ट से न रहें अनजान, ये आजोन परत को पहुंचा रहा नुकसान
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वाराणसी। आपने कभी गौर किया है कि अपने घर पर जो कबाड़ बेचते हैं, उसमें पुराने अखबारों, बोतल के साथ एक खतरनाक चीज जुड़ गई है ई कचरा। मोबाइल, सीडी, टीवी, फ्रिज ऐसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक आइटम हमारी जिंदगी का इतना अहम हिस्सा बन गए हैं कि पुराने के बदले हम फ ौरन लेटेस्ट तकनीक वाला सामान खरीद लेते हैं। पुरानी सीडी व दूसरे ई वेस्ट को डस्टबिन में फेंकते वक्त हम कभी गौर नहीं करते कि कबाड़ी वाले तक पहुंचने के बाद यह कबाड़ हमारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है। बस, यही है ई-वेस्ट का साइलेंट खतरा। इन वस्तुओं को बनाने में कई हानिकारक और जहरीले तत्वों का उपयोग होता है, जो हमारे पर्यावरण में घुलकर ओेेजोन परत को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
ये है ओजोन की परत-
ओजोन पीले रंग की प्राकृतिक गैस, जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी है। सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों को धरती पर आने से रोकने वाली ओजोन लेयर अब काफी पतली हो रही है और उसमें छेद भी हो चुका है।
ओजोन लेयर को खतरा-
हमारे वायुमंडल में बढ़ती रसायनिक गैसों की वजह से ओजोन लेयर को नुकसान पहुंच रहा है। इनमें सबसे खतरनाक है क्लोरो फ्लोरो कार्बन, जो ओजोन के परमाणुओं को खत्म कर सकता है।
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- स्वास्थ्य और पर्यावरण को खतरा
इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को बनाने के उपयोग में आने वाली सामग्रियों में ज्यादातर कैडमियम, निकेल, क्रोमियम, आर्सेनिक का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी घातक है। कैडमियम व मरकरी जैसे घातक तत्व जलाए जाने पर सीधे वातारण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है।
ये कहते हैं विशेषज्ञ
आर्य महिला पीजी कालेज में समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. एस स्वाती मिश्रा बताती हैं कि जब हम कुछ भी फेंकते हैं तो वह कहीं न कहीं अवश्य जाता है’। एनी लियोनार्ड का यह कथन ई-कचरे से होने वाले ओजोन परत के क्षरण के संदर्भ में सत्य प्रतीत हो रहा है। इलेक्ट्रानिक उपकरणों से संपूर्ण दुनिया में लगभग 7.6 प्रतिशत कचरे का एकत्रीकरण बढ़ रहा है। जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि एवं कैंसर जैसी भयावह बीमारी का विस्तार हो रहा है।
बीएचयू भौतिकी विभाग के प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव कहते हैं कि ओजोन लेयर होना, पेड़ पौधे और मनुष्य के लिए बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए कि अगर ये नहीं होता तो अल्ट्रावायलट रेडिएशन जमीन तक पहुंच जातीं और यहां जीवन नहीं होता है। दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव में ओजोन का कम होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन कारखानों से जिस तरह से रसायन निकल रहे हैं, इसने प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है। इस पर अंकुश लगाने के लिए सभी को जागरूक रहने की जरूरत है।
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ये है ओजोन की परत-
ओजोन पीले रंग की प्राकृतिक गैस, जो ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी है। सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों को धरती पर आने से रोकने वाली ओजोन लेयर अब काफी पतली हो रही है और उसमें छेद भी हो चुका है।
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ओजोन लेयर को खतरा-
हमारे वायुमंडल में बढ़ती रसायनिक गैसों की वजह से ओजोन लेयर को नुकसान पहुंच रहा है। इनमें सबसे खतरनाक है क्लोरो फ्लोरो कार्बन, जो ओजोन के परमाणुओं को खत्म कर सकता है।
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- स्वास्थ्य और पर्यावरण को खतरा
इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को बनाने के उपयोग में आने वाली सामग्रियों में ज्यादातर कैडमियम, निकेल, क्रोमियम, आर्सेनिक का इस्तेमाल किया जाता है। ये सभी पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी घातक है। कैडमियम व मरकरी जैसे घातक तत्व जलाए जाने पर सीधे वातारण में घुलते हैं। इनका अवशेष पर्यावरण के विनाश का कारण बनता है।
ये कहते हैं विशेषज्ञ
आर्य महिला पीजी कालेज में समाजशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. एस स्वाती मिश्रा बताती हैं कि जब हम कुछ भी फेंकते हैं तो वह कहीं न कहीं अवश्य जाता है’। एनी लियोनार्ड का यह कथन ई-कचरे से होने वाले ओजोन परत के क्षरण के संदर्भ में सत्य प्रतीत हो रहा है। इलेक्ट्रानिक उपकरणों से संपूर्ण दुनिया में लगभग 7.6 प्रतिशत कचरे का एकत्रीकरण बढ़ रहा है। जिससे वैश्विक तापमान में वृद्धि एवं कैंसर जैसी भयावह बीमारी का विस्तार हो रहा है।
बीएचयू भौतिकी विभाग के प्रोफेसर मनोज श्रीवास्तव कहते हैं कि ओजोन लेयर होना, पेड़ पौधे और मनुष्य के लिए बहुत जरूरी है। ऐसा इसलिए कि अगर ये नहीं होता तो अल्ट्रावायलट रेडिएशन जमीन तक पहुंच जातीं और यहां जीवन नहीं होता है। दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव में ओजोन का कम होना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन कारखानों से जिस तरह से रसायन निकल रहे हैं, इसने प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया है। इस पर अंकुश लगाने के लिए सभी को जागरूक रहने की जरूरत है।