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Varanasi News: अघोर चतुर्दशी पर 300 साधकों ने किया योगिनी चक्र पूजन
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हरिश्चंद्र घाट पर अघोर चतुर्दशी पर आयोजित पूजा में शामिल कपाली बना व अन्य। अमर उजाला
वाराणसी। अघोर चतुर्दशी के अवसर पर हरिश्चंद्र घाट स्थित अघोर पीठ में बुधवार को दिव्य योगिनी चक्र और श्मशान पीठ पूजन संपन्न हुआ। अवधूत उग्र चंडेश्वर कपाली बाबा के सानिध्य में हुए इस अनुष्ठान में करीब 300 साधक शामिल हुए। यह आयोजन अवधूत बाबा कीनाराम की 427वीं जयंती के उपलक्ष्य में किया गया था।
मध्यरात्रि में शुरू हुआ यह अनुष्ठान बृहस्पतिवार की भोर तक चला। कपाली बाबा ने बताया कि अघोर परंपरा में श्मशान को आत्मचिंतन का आध्यात्मिक स्थल माना जाता है। उन्होंने कहा कि योगिनी चक्र पूजन तांत्रिक और शाक्त साधना से जुड़ा है। इसमें योगिनी शक्तियों का स्मरण और पूजन किया जाता है। साधना परंपरा में योगिनियों को शक्ति के विभिन्न स्वरूपों और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर 12 वर्ष की साधना पूरी करने वाले साधकों को मुंडमाला दीक्षा दी गई। वहीं, 24 वर्ष की साधना पूरी कर चुके साधकों का पूर्णाभिषेक पूजन संपन्न हुआ। काशी की प्राचीन अघोर परंपरा और साधना से जुड़े इस पर्व पर विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन किए गए। हरिश्चंद्र घाट का संबंध प्राचीन काल से ही विभिन्न साधना परंपराओं से रहा है। इस पूजन को इसी आध्यात्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
श्मशान पीठ पूजन का महत्व
हरिश्चंद्र घाट काशी के प्रमुख श्मशान घाटों में से एक है। यहां होने वाला श्मशान पीठ पूजन अघोर साधना की उस अवधारणा को दर्शाता है। इसमें साधक जीवन की नश्वरता, भय और मृत्यु के बोध से ऊपर उठकर आत्मचिंतन करते हैं। अघोर दर्शन में बाहरी भेदभाव से ऊपर उठकर समत्व, करुणा और आत्मबोध को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अनुष्ठान साधकों को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने में सहायता करता है। योगिनी चक्र पूजन तांत्रिक और शाक्त साधना की परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। इसमें आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के रूप में योगिनियों का स्मरण किया जाता है।
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मध्यरात्रि में शुरू हुआ यह अनुष्ठान बृहस्पतिवार की भोर तक चला। कपाली बाबा ने बताया कि अघोर परंपरा में श्मशान को आत्मचिंतन का आध्यात्मिक स्थल माना जाता है। उन्होंने कहा कि योगिनी चक्र पूजन तांत्रिक और शाक्त साधना से जुड़ा है। इसमें योगिनी शक्तियों का स्मरण और पूजन किया जाता है। साधना परंपरा में योगिनियों को शक्ति के विभिन्न स्वरूपों और आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर 12 वर्ष की साधना पूरी करने वाले साधकों को मुंडमाला दीक्षा दी गई। वहीं, 24 वर्ष की साधना पूरी कर चुके साधकों का पूर्णाभिषेक पूजन संपन्न हुआ। काशी की प्राचीन अघोर परंपरा और साधना से जुड़े इस पर्व पर विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन किए गए। हरिश्चंद्र घाट का संबंध प्राचीन काल से ही विभिन्न साधना परंपराओं से रहा है। इस पूजन को इसी आध्यात्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
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श्मशान पीठ पूजन का महत्व
हरिश्चंद्र घाट काशी के प्रमुख श्मशान घाटों में से एक है। यहां होने वाला श्मशान पीठ पूजन अघोर साधना की उस अवधारणा को दर्शाता है। इसमें साधक जीवन की नश्वरता, भय और मृत्यु के बोध से ऊपर उठकर आत्मचिंतन करते हैं। अघोर दर्शन में बाहरी भेदभाव से ऊपर उठकर समत्व, करुणा और आत्मबोध को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अनुष्ठान साधकों को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने में सहायता करता है। योगिनी चक्र पूजन तांत्रिक और शाक्त साधना की परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। इसमें आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के रूप में योगिनियों का स्मरण किया जाता है।
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