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राष्ट्रीय युवा दिवस: समाज को बेहतर बनाने में योगदान दे रहे ये युवा, संकट में सारथी, हुनर से बने सहारा

Tue, 12 Jan 2021 10:55 AM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Tue, 12 Jan 2021 10:55 AM IST
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National Youth Day: These youth who are contributing to improve society support made of skills
नेहा, और खाना खिलाते अनिल। - फोटो : अमर उजाला

युवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है। समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का होता है। काशी में भी कई ऐसे युवा हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में न केवल हुनर को निखार कर परिवार को संकट से उबारा, बल्कि बेजुबानों की भूख भी मिटाई। कई ऐसे युवा भी है जिन्होंने काशी की संस्कृति को संजोते हुए युवाओं को जोड़ने का बीड़ा उठाया है। राष्ट्रीय युवा दिवस पर हम ऐसे ही कुछ युवा चेहरों से रूबरू होंगे जो समाज के लिए एक प्रेरणा श्रोत हैं। मुसीबतें भी इनके हौसले और जुनून को डिगा नहीं पाई।

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कोरोना वार्ड में ड्यूटी के साथ बेजुबानों की सेवा में जुटे अनिल
बीएचयू ट्रामा सेंटर में नर्सिंग अधिकारी अनिल दानु कोरोना वार्ड में अपनी ड्यूटी कर रात में अपने अपार्टमेंट में आ रहे थे। उन्होंने कई जानवरों को भूख से तड़पते देखा। पूरे दिन पीपीई किट पहनकर ड्यूटी करने के बाद घर वापस आते वक्त मुझे काफी नींद आ रही थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा तो नींद गायब हो गई। तुरंत अपने फ्लैट में गया और किचन से बिस्किट व ब्रेड लाकर उनको खिलाया। उस दिन मुझे एहसास हुआ, जिस वक्त हम सब अपने परिवार के साथ समय बिता रहे हैं। वहीं इन बेजुबानों के पास पेट भरने का जरिया भी खत्म हो गया है। उस दिन से अनिल अपनी छुट्टियां रद्द कर दिन रात अस्पताल में मरीजों की सेवा करते और ड्यूटी खत्म होते ही खाने के सामान के साथ अपने घर के आसपास घूमने वाले जानवरों का पेट भरते। अनिल के इस नेक कार्य में उनके दोस्त अभिषेक उपाध्याय, आजाद पांडेय  आंचल यादव ने भी मदद की।
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साची जोत जगाते हैं तानाबाना के स्वर सूत्र
भरे बाजार में खड़े होकर दुनिया को खरी खरी सुनाने वाले कबीर साहेब की सपाट बयानी की टूट चुकी रवायत को एक बार फिर नई कड़ियों से बांधा है, सूफियाना मिजाज वाले कुछ नौजवानों ने। देवेंद्र दास देव, डॉ. हरीश, डॉ. भागीरथी, उमेश कबीर, कृष्णा और गौरव ये नौजवान खंजड़ी ओर करताल पर कबीर के दोहों और सखियों को सुर-ताल के पंखों की नई उड़ाने दे रहे हैं। बदले में काशी के फक्कड़ मिजाज से प्रेरणा ले रहे हैं। युवाओं के  इस समूह का नाम है तानाबाना। इस ग्रुप के देवेंद्र बताते हैं कि तानाबाना कबीर के विचार का जीवंत प्रवाह हैं। आज का युवा धार्मिक संगीत से दूर होता जा रहा है। ताना बाना समूह ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर कबीर के पदों को ऐसा सांगीतिक स्वरूप दिया है, जिसे सुनते ही युवा वर्ग इसे जानने के लिए उत्सुक हो जाए। इस समूह का सदस्य बनने की सबसे बड़ी शर्त है कबीर के आदेशों पर चलना। इस समूह के जितने भी सदस्य हें वे सभी कबीर विचारों के अनुगामी हैं।

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हमारी छोरियां किसी से कम नहीं
कोरोना की वजह से जब सबके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा था। ऐसे वक्त में हमारी छोरियां माता-पिता की लाठी बनीं। हम बात कर रहे हैं अभ्युदय संस्था से जुड़कर काशी जूट क्रिएशन में काम करने वाली नेहा व सोनी वर्मा की। विपरीत परिस्थितियों में इन बेटियों ने हार नहीं मानी और अपने हुनर से जूट बैग तैयार कर परिवार को आर्थिक संकट से उबारा। सिलाई-कढ़ाई कर नेहा ने माता-पिता व चार छोटे भाई-बहनों का पेट भरने के लिए आठ से दस घंटे काम करके घर की आर्थिक स्थिति को संभाला। तो वहीं लॉकडाउन में सोनी के पिता की साइकिल रिपेयरिंग का काम पूरी तरह से ठप पड़ गया था। तब सोनी ने पिता की मदद करने की ठानी और संस्था में जाकर जूट उद्योग का काम सीखा। सप्ताह भर की मेहनत के बाद सोनी न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रही है, बल्कि घर की आर्थिक जिम्मेदारी में निभाने में पिता के कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही है। इस उद्योग से जुड़कर उन्हें हर महीने 6 से 7 हजार की आर्थिक मदद मिल रही है।



जरूरतमंद बच्चों के हाथों में आईं किताबें तो खिल उठे चेहरे
कभी रेलवे स्टेशन के किनारे तो कभी किसी मंदिर के प्रांगण में शुरू हुई पाठशाला अब तक कई छात्र-छात्राओं की जिंदगी बदल दी है। स्टेशन पर छूटे हुए बच्चे अपना पेट पालने के लिए बाल मजदूरी करने, कूड़ा-करकट बीनने और भीख मांगने वाले बच्चों के हाथों में आज कॉपी और कलम है। आज वे सपने देख रहे हैं और अपने हौसलों को बुलंद कर रहे हैं। इन बच्चों का ये सपना सच कर रही हैं काशी की दो बेटियां रोमा व रिमझिम। बाल गृह शिशु से जुड़ी ये दोनों बेटियां समाज के उस तबके के बच्चों के सपनों में रंग भर रहीं है जो इसका ककहरा भी नहीं जानते थे। लेकिन आज ये सब कुछ छोड़कर पढ़ाई कर रहे हैं, अपने भविष्य की नींव मजबूत कर रहे हैं। रोमा व रिमझिम सिर्फ बच्चों को पढ़ाती नहीं, बल्कि इन बच्चों का प्राथमिक स्कूलों में दाखिला भी कराती हैं। अब तक इन दोनों ने 30 से ज्यादा बच्चों का दाखिला स्कूल में कराया है।

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