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Varanasi News: नामवर सिंह ने कविता को समय से जोड़कर देखा, आलोचना का किया जनवादी विस्तार
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वाराणसी। प्रसिद्ध हिंदी आलोचक डॉ. नामवर सिंह की जन्मशती पर उदय प्रताप कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से सोमवार को ‘डॉ. नामवर सिंह : हिंदी आलोचना का संवादी स्वर’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने नामवर सिंह के आलोचना विवेक, मार्क्सवादी चिंतन, साहित्यिक दृष्टि और संवाद की परंपरा को याद किया।
प्रसिद्ध कवि मदन कश्यप ने कहा कि नामवर सिंह ने मार्क्सवादी आलोचना का जनवादी विस्तार किया। वह पहले ऐसे आलोचकों में थे, जिन्होंने कविता को उसके समय और सामाजिक संदर्भों से जोड़ कर देखा। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रो. अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि नामवर सिंह के व्यक्तित्व और विचारों के निर्माण में कामता प्रसाद विद्यार्थी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशिष्ट अतिथि और प्राचीन छात्र एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रामसुधार सिंह ने कहा कि नामवर सिंह बहुपठित आलोचक थे। प्राचार्य प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि नामवर सिंह विचारों की जीवंत मिसाल थे। सत्र का संचालन प्रो. गोरखनाथ ने किया और आभार अशोक आनंद ने जताया।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र का विषय ‘डॉ. नामवर सिंह का आलोचना विवेक’ रहा। अध्यक्षता करते हुए प्रो. तरुण कुमार ने कहा कि नामवर सिंह ने कविता के माध्यम से आलोचना को नए मूल्यों की खोज के साथ विस्तार दिया। वरिष्ठ आलोचक डॉ. गया सिंह ने कहा कि नामवर सिंह का आलोचना विवेक मिट्टी, गिट्टी और लिट्टी के साथ विकसित हुआ। प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि नामवर सिंह ने आलोचना को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाया। प्रो. राजकुमार ने नामवर सिंह की कक्षाओं के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह कक्षा में पढ़ाने से अधिक विद्यार्थियों को सोचने और समझने की दृष्टि सिखाते थे। संचालन डॉ. विंध्याचल यादव ने किया और आभार प्रो. मधु सिंह ने जताया। तीसरे सत्र का विषय ‘हिंदी कथा आलोचना और डॉ. नामवर सिंह’ रहा। अध्यक्षता करते हुए प्रो. बलराज पांडेय ने कहा कि नामवर सिंह ने अंग्रेजी ढंग के उपन्यासों का विरोध करते हुए हिंदी ढंग के उपन्यासों के पक्ष में तर्क दिए। आलोचक भालचंद्र जोशी ने कहा कि नामवर सिंह ने कहानी आलोचना में यथार्थ के ‘इनर मैप’ यानी आंतरिक मानचित्र का अभूतपूर्व विस्तार किया। कथाकार डॉ. प्रवीण कुमार ने कहा कि नामवर सिंह के मार्क्सवादी चिंतन में व्यक्ति निष्ठा और क्षेत्रीयता का अनूठा संरक्षण व समन्वय दिखाई देता है। डॉ. रश्मि रावत ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना किसी रूढ़ निष्कर्ष पर आधारित नहीं थी, बल्कि वह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया थी। संचालन डॉ. अनिल कुमार सिंह ने किया और आभार प्रो. सुधीर राय ने जताया। इस मौके पर प्रो. एसके सिंह, प्रो. अरविंद त्रिपाठी, प्रो. प्रज्ञा पारमिता, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. प्रकाश उदय आदि मौजूद रहे।
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प्रसिद्ध कवि मदन कश्यप ने कहा कि नामवर सिंह ने मार्क्सवादी आलोचना का जनवादी विस्तार किया। वह पहले ऐसे आलोचकों में थे, जिन्होंने कविता को उसके समय और सामाजिक संदर्भों से जोड़ कर देखा। सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रो. अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि नामवर सिंह के व्यक्तित्व और विचारों के निर्माण में कामता प्रसाद विद्यार्थी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशिष्ट अतिथि और प्राचीन छात्र एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रामसुधार सिंह ने कहा कि नामवर सिंह बहुपठित आलोचक थे। प्राचार्य प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि नामवर सिंह विचारों की जीवंत मिसाल थे। सत्र का संचालन प्रो. गोरखनाथ ने किया और आभार अशोक आनंद ने जताया।
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संगोष्ठी के दूसरे सत्र का विषय ‘डॉ. नामवर सिंह का आलोचना विवेक’ रहा। अध्यक्षता करते हुए प्रो. तरुण कुमार ने कहा कि नामवर सिंह ने कविता के माध्यम से आलोचना को नए मूल्यों की खोज के साथ विस्तार दिया। वरिष्ठ आलोचक डॉ. गया सिंह ने कहा कि नामवर सिंह का आलोचना विवेक मिट्टी, गिट्टी और लिट्टी के साथ विकसित हुआ। प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि नामवर सिंह ने आलोचना को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाया। प्रो. राजकुमार ने नामवर सिंह की कक्षाओं के अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह कक्षा में पढ़ाने से अधिक विद्यार्थियों को सोचने और समझने की दृष्टि सिखाते थे। संचालन डॉ. विंध्याचल यादव ने किया और आभार प्रो. मधु सिंह ने जताया। तीसरे सत्र का विषय ‘हिंदी कथा आलोचना और डॉ. नामवर सिंह’ रहा। अध्यक्षता करते हुए प्रो. बलराज पांडेय ने कहा कि नामवर सिंह ने अंग्रेजी ढंग के उपन्यासों का विरोध करते हुए हिंदी ढंग के उपन्यासों के पक्ष में तर्क दिए। आलोचक भालचंद्र जोशी ने कहा कि नामवर सिंह ने कहानी आलोचना में यथार्थ के ‘इनर मैप’ यानी आंतरिक मानचित्र का अभूतपूर्व विस्तार किया। कथाकार डॉ. प्रवीण कुमार ने कहा कि नामवर सिंह के मार्क्सवादी चिंतन में व्यक्ति निष्ठा और क्षेत्रीयता का अनूठा संरक्षण व समन्वय दिखाई देता है। डॉ. रश्मि रावत ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना किसी रूढ़ निष्कर्ष पर आधारित नहीं थी, बल्कि वह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया थी। संचालन डॉ. अनिल कुमार सिंह ने किया और आभार प्रो. सुधीर राय ने जताया। इस मौके पर प्रो. एसके सिंह, प्रो. अरविंद त्रिपाठी, प्रो. प्रज्ञा पारमिता, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. प्रकाश उदय आदि मौजूद रहे।
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