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समाज की साहित्यिक स्मृति है नागरी प्रचारिणी सभा: दयाशंकर मिश्र दयालु
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शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में रविवार को नागरी प्रचारिणी सभागार में श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदास की अमर काव्यकृति श्रीरामचरितमानस का सस्वर अखंड पाठ हुआ। युवाओं और काव्यरसिकों के साथ नगरवासी इसमें शामिल हुए। विभिन्न सत्रों में अतिथियों ने नागरी प्रचारिणी सभा के साहित्य के क्षेत्र में दिए विशिष्ट योगदान पर विचार रखे।
राज्यमंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्र ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा समाज की साहित्यिक स्मृति है। उसके पुनर्जीवन से बौद्धिक जीवन को सहारा मिला है। विधान परिषद के सदस्य धर्मेंद्र राय ने कहा कि सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय में मौजूद अभिलेखों और साक्ष्यों ने देश के इतिहास के परिप्रेक्ष्य को समय समय पर सुधारा है और नई दिशा दी है। उन्होंने अखबारों की मूल्यवान पुरानी फाइलों को देखने और उनसे सीखने के अपने पुराने अनुभव भी साझा किए। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा के पास गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का बौद्धिक उत्तराधिकार है, क्योंकि सभा ने ही आज से 123 वर्ष पहले सन् 1903 में मानस का सुशोधित व सुसंपादित संस्करण का पहला प्रकाशित किया था। 1923 में सभा ने ही तुलसीदासजी की ग्रंथावली का पहला संस्करण प्रकाशित किया था, जिसके संपादक हिंदी के यशस्वी समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल थे। आगे चलकर आचार्य शुक्ल ने ही अपने आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास के कवि व्यक्तित्व को लोकमंगल और लोक मर्यादा के पैमाने पर स्थापित किया। इस दौरान लोगों ने सभा की तीनों कला दीर्घा का अवलोकन किया। इस मौके पर देश के प्रसिद्ध चित्रकार मनीष पुष्कले, रीना लाठ, पं. पूरन महाराज, आचार्य विवेकदास, दीपेश चौधरी, अशोक कपूर, प्रो. सुरेंद्र प्रताप, सत्यनारायण पांडेय, डॉ. इंदीवर, मुकुंद उपाध्याय, विनोद शंकर उपाध्याय, संतोष राय, राजेश राय, शशांक पाठक, अरविंद गुप्ता के अलावा शोधार्थी और युवा विद्यार्थी मौजूद रहे।
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राज्यमंत्री डॉ. दयाशंकर मिश्र ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा समाज की साहित्यिक स्मृति है। उसके पुनर्जीवन से बौद्धिक जीवन को सहारा मिला है। विधान परिषद के सदस्य धर्मेंद्र राय ने कहा कि सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय में मौजूद अभिलेखों और साक्ष्यों ने देश के इतिहास के परिप्रेक्ष्य को समय समय पर सुधारा है और नई दिशा दी है। उन्होंने अखबारों की मूल्यवान पुरानी फाइलों को देखने और उनसे सीखने के अपने पुराने अनुभव भी साझा किए। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा के पास गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं का बौद्धिक उत्तराधिकार है, क्योंकि सभा ने ही आज से 123 वर्ष पहले सन् 1903 में मानस का सुशोधित व सुसंपादित संस्करण का पहला प्रकाशित किया था। 1923 में सभा ने ही तुलसीदासजी की ग्रंथावली का पहला संस्करण प्रकाशित किया था, जिसके संपादक हिंदी के यशस्वी समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल थे। आगे चलकर आचार्य शुक्ल ने ही अपने आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास के कवि व्यक्तित्व को लोकमंगल और लोक मर्यादा के पैमाने पर स्थापित किया। इस दौरान लोगों ने सभा की तीनों कला दीर्घा का अवलोकन किया। इस मौके पर देश के प्रसिद्ध चित्रकार मनीष पुष्कले, रीना लाठ, पं. पूरन महाराज, आचार्य विवेकदास, दीपेश चौधरी, अशोक कपूर, प्रो. सुरेंद्र प्रताप, सत्यनारायण पांडेय, डॉ. इंदीवर, मुकुंद उपाध्याय, विनोद शंकर उपाध्याय, संतोष राय, राजेश राय, शशांक पाठक, अरविंद गुप्ता के अलावा शोधार्थी और युवा विद्यार्थी मौजूद रहे।
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