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संगीत और नृत्य ने सुधार दी काया
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
Updated Fri, 15 May 2015 02:04 AM IST
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जिनके हाथों की सिकुड़ी उंगलियां खुलती तक नहीं थी, वे अब तबले पर थाप दे रहे हैं और उस तबले से निकले संगीत को सुन लोग मंत्रमुग्ध हो रहे हैं। जो युवती पैर से लाचार थी वह कथक नृत्य में न केवल पारंगत हो रही है, बल्कि चलने भी लगी है। यह सब कमाल किया है कला और संगीत ने।
खारी कुआं के सिद्धांत दास के लिए तबला वादन वरदान साबित हुआ। तीन साल की उम्र में ही हाथ-पैर बेदम हो गए। मां शिबली और पिता मृत्युंजय दास चिकित्सकों के पास भटके। दवा और फिजियोथेरेपी से खास फायदा नहीं हुआ। चचेरे भाई को देखकर सिद्धांत के मन में तबला बजाने का शौक पला। माता-पिता शहर के कई गुरुओं के पास ले गए लेकिन उंगलियां टेढ़ी होने से सभी ने उसे तबला सिखाने से मना कर दिया।
बाद में शिबली की मुलाकात रामापुरा में पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत संस्थान के निदेशक ठुमरी गायक पं. गणेश मिश्र से हुई। उन्होंने सिद्धांत को तबला सिखाने को हां कर दी। पांच साल के अभ्यास के बाद अब उसकी उंगलियां तो सीधी हुईं ही वो बिना सहारे के अपने कार्य भी करने लगा। इसी तरह रामापुरा की ही एक युवती का दायां पैर काम नहीं करता था। उसने भी कथक का अभ्यास इसी केंद्र में करना शुरू किया। वो नृत्यांगना बनने के साथ अब चलने भी लगी है। दशाश्वमेध के विक्रांत की आंखों से दिखता कम था लेकिन उसने गिटार सीखने की ठानी। गिटार को साधकर अब हुनर ने उसे जिंदगी की नई पटरी से जोड़ दिया। रॉक बैंड में प्रस्तुति से पैसा और नाम दोनों मिलने लगा है।
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संगीत किसी भी तरह की विकलांगता दूर करने के लिए वरदान साबित हुआ है। अगर मन से साधना की जाए तो नृत्य के लय-ताल के अनुशासन में चलने की सीख मिलती है आदत का भी विकास होता है। मानसिक और शारीरिक विकलांग बच्चे जीवन में बदलाव के लिए मेरे पास भी नृत्य सीखने आते हैं। बनारस में कथक नृत्य के जरिए विकलांगता से उबरने वाली बेटी को मैं बहुत आशीर्वाद दे रहा हूं। -पं. बिरजू महाराज, प्रख्यात कथक नृत्य गुरु
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खारी कुआं के सिद्धांत दास के लिए तबला वादन वरदान साबित हुआ। तीन साल की उम्र में ही हाथ-पैर बेदम हो गए। मां शिबली और पिता मृत्युंजय दास चिकित्सकों के पास भटके। दवा और फिजियोथेरेपी से खास फायदा नहीं हुआ। चचेरे भाई को देखकर सिद्धांत के मन में तबला बजाने का शौक पला। माता-पिता शहर के कई गुरुओं के पास ले गए लेकिन उंगलियां टेढ़ी होने से सभी ने उसे तबला सिखाने से मना कर दिया।
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बाद में शिबली की मुलाकात रामापुरा में पं. महादेव प्रसाद मिश्र संगीत संस्थान के निदेशक ठुमरी गायक पं. गणेश मिश्र से हुई। उन्होंने सिद्धांत को तबला सिखाने को हां कर दी। पांच साल के अभ्यास के बाद अब उसकी उंगलियां तो सीधी हुईं ही वो बिना सहारे के अपने कार्य भी करने लगा। इसी तरह रामापुरा की ही एक युवती का दायां पैर काम नहीं करता था। उसने भी कथक का अभ्यास इसी केंद्र में करना शुरू किया। वो नृत्यांगना बनने के साथ अब चलने भी लगी है। दशाश्वमेध के विक्रांत की आंखों से दिखता कम था लेकिन उसने गिटार सीखने की ठानी। गिटार को साधकर अब हुनर ने उसे जिंदगी की नई पटरी से जोड़ दिया। रॉक बैंड में प्रस्तुति से पैसा और नाम दोनों मिलने लगा है।
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संगीत किसी भी तरह की विकलांगता दूर करने के लिए वरदान साबित हुआ है। अगर मन से साधना की जाए तो नृत्य के लय-ताल के अनुशासन में चलने की सीख मिलती है आदत का भी विकास होता है। मानसिक और शारीरिक विकलांग बच्चे जीवन में बदलाव के लिए मेरे पास भी नृत्य सीखने आते हैं। बनारस में कथक नृत्य के जरिए विकलांगता से उबरने वाली बेटी को मैं बहुत आशीर्वाद दे रहा हूं। -पं. बिरजू महाराज, प्रख्यात कथक नृत्य गुरु