STF का बड़ा एक्शन: 16 साल पहले पुलिस अभिरक्षा से फरार हत्या का दोषी गिरफ्तार, 25 हजार रुपये घोषित था इनाम
वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन के पीछे से एसटीएफ ने 16 साल से फरार हत्या के दोषी को पकड़ा। आरोपी को दबोचकर कोतवाली थाने की पुलिस को सौंपा गया। आरोपी पर 25 हजार रुपये का इनाम घोषित था।
विस्तार
वाराणसी के मंडलीय अस्पताल से 16 वर्ष पहले पुलिस अभिरक्षा से फरार हत्या के दोषी कैदी को एसटीएफ ने कैंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-9 के पीछे से गिरफ्तार किया है। उसकी पहचान बस्ती जिले के हरैया थाना के महाराजगंज मिसिर गंजा निवासी सुरेश मिश्रा उर्फ लाल बहादुर राम के रूप में हुई है। सुरेश पर 25 हजार रुपये का इनाम घोषित था। उसके पास से एक मोबाइल बरामद कर एसटीएफ ने उसे कोतवाली थाने की पुलिस को सौंप दिया।
एसटीएफ की वाराणसी इकाई के एडिशनल एसपी विनोद कुमार सिंह ने बताया कि सुरेश मिश्रा को हत्या का दोष सिद्ध होने पर 24 मार्च 2007 को उम्रकैद की सजा और 20 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया था। सुरेश शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में निरुद्ध किया गया था। 2008 में उसे पीलिया हुआ था। उपचार के लिए उसे मंडलीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। नौ अक्तूबर 2008 को वह पुलिस अभिरक्षा से अस्पताल से फरार हो गया था।
कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। जानकारी मिली कि सुरेश मिश्रा की वाराणसी आता-जाता रहता है। मंगलवार को मुखबिर ने बताया कि सुरेश कैंट रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-9 के पीछे मौजूद है तो घेराबंदी कर एसटीएफ की टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
जमीन विवाद में पट्टीदार की हत्या की थी
सुरेश ने पूछताछ में बताया कि उसका पट्टीदार रामाशीष मिश्रा से जमीन संबंधी विवाद चल रहा था। 12 फरवरी 2001 को बांस काटने को लेकर दोनों पक्षों में विवाद हुआ। उसी दौरान उसने रामाशीष के पक्ष से आए विनोद मिश्रा की चाकू मारकर हत्या कर दी थी। इस संबंध में बस्ती जिले के हरैया थाने में सुरेश मिश्रा और उसके भाई रामसागर मिश्रा के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ था। उसे स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था और अदालत ने सजा सुनाई थी।
भाग गया था दिल्ली, करता था राजगीर का काम
सुरेश ने बताया कि मंडलीय अस्पताल से फरार होने के बाद वह दिल्ली चला गया था। वहां लाल बहादुर राम के नाम से वह रहने लगा और राजगीर का काम करता था। इसके बाद वह शहर बदलता चला गया और लाल बहादुर के नाम से ही राजगीर का काम करता रहा। डेढ़ दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद वह आश्वस्त हो गया था कि पुलिस न अब उसे पहचान पाएगी और न पकड़ पाएगी।