{"_id":"59184ecc4f1c1b0f3c851196","slug":"mothers-day-special-salute-to-ballia-mother-for-his-hard-work","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":" मदर्स डे स्पेशलः बलिया के इस मां को सलाम, माला गूंथकर बेटे को बनाया अधिकारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मदर्स डे स्पेशलः बलिया के इस मां को सलाम, माला गूंथकर बेटे को बनाया अधिकारी
ब्यूरो,अमर उजाला,बलिया
Updated Sun, 14 May 2017 06:43 PM IST
विज्ञापन
मां इंदू सिंह और बेटा निशिराज सिंह
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मां की ममता, धैर्य, परिश्रम, हौसला का कोई सानी नहीं होता। अपने बच्चों के लालन-पालन से लेकर उसे शिक्षित कर कमाऊ बनाने का सपना हर मां सजोती हैं और अंतिम सांस तक उसके खैरियत की कामना भी करती हैं। बलिया जिले के सुखपुरा कस्बा की एक मां ने पति की मौत के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और बेटे को पढ़ा लिखा कर आईबी अफसर बनाया।
आज कस्बा के साथ ही आसपास के गांवों के लोग भी इस मां के हिम्मत व परिश्रम की दाद देते हैं।
कस्बा निवासी निशिराज सिंह आईबी अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। निशिराज के पिता भृगुनाथ सिंह कस्बा में ही स्टूडियो चलाकर परिवार का भरण पोषण करते थे।
निशिराज की उम्र करीब आठ साल थी तभी अचानक पिता का साया उठ गया और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां इंदू सिंह की कंधों पर आ गया। निशिराज का से दो साल छोटा एक और भाई भी है। पति के मौत के बाद भी इंदू सिंह पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उन्होंने बच्चों के सामने दु:ख नहीं दिखने दिया।
परिवार चलाने के साथ दो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई आदि की बड़ी जिम्मेदारी इंदू के कंधों पर थी, लिहाजा उन्होंने घर में माला गूंथने का काम शुरू कर दिया। माला गुथाई से जो भी पैसे मिलते थे। उससे इंदू ने बच्चों की परिवरिश शुरु किया।
विज्ञापन
उन्होंने बच्चों के पढ़ाई-लिखाई में किसी तरह की कमी महसूस नहीं होने दिया। इंदू के लिए अब सब कुछ उसके दोनों बच्चे ही थे जिसे वह पढ़ा कर कमाऊ बनाने की सपना संजोए थी। बड़े बेटे निशिराज को पटना व इलाहाबाद में पढ़ाया।
मां की मेहनत आखिरकार रंग लाइ्र और एक दिन निशिराज आईबी अधिकारी बन गया। आज भी निशिराज अपनी हर सफलता का श्रेय मां को ही देते हैं। निशिराज ने बताया कि मां ने अपने दुख का साया हमलोगों पर नहीं पड़ने दिया और माला गूंथ कर पैसा इकट्ठा करके हम दोनों भाईयों के जरुरत को पूरा करती थीं।
विज्ञापन
आज कस्बा के साथ ही आसपास के गांवों के लोग भी इस मां के हिम्मत व परिश्रम की दाद देते हैं।
कस्बा निवासी निशिराज सिंह आईबी अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। निशिराज के पिता भृगुनाथ सिंह कस्बा में ही स्टूडियो चलाकर परिवार का भरण पोषण करते थे।
निशिराज की उम्र करीब आठ साल थी तभी अचानक पिता का साया उठ गया और परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां इंदू सिंह की कंधों पर आ गया। निशिराज का से दो साल छोटा एक और भाई भी है। पति के मौत के बाद भी इंदू सिंह पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन उन्होंने बच्चों के सामने दु:ख नहीं दिखने दिया।
विज्ञापन
परिवार चलाने के साथ दो बच्चों की पढ़ाई-लिखाई आदि की बड़ी जिम्मेदारी इंदू के कंधों पर थी, लिहाजा उन्होंने घर में माला गूंथने का काम शुरू कर दिया। माला गुथाई से जो भी पैसे मिलते थे। उससे इंदू ने बच्चों की परिवरिश शुरु किया।
विज्ञापन
उन्होंने बच्चों के पढ़ाई-लिखाई में किसी तरह की कमी महसूस नहीं होने दिया। इंदू के लिए अब सब कुछ उसके दोनों बच्चे ही थे जिसे वह पढ़ा कर कमाऊ बनाने की सपना संजोए थी। बड़े बेटे निशिराज को पटना व इलाहाबाद में पढ़ाया।
मां की मेहनत आखिरकार रंग लाइ्र और एक दिन निशिराज आईबी अधिकारी बन गया। आज भी निशिराज अपनी हर सफलता का श्रेय मां को ही देते हैं। निशिराज ने बताया कि मां ने अपने दुख का साया हमलोगों पर नहीं पड़ने दिया और माला गूंथ कर पैसा इकट्ठा करके हम दोनों भाईयों के जरुरत को पूरा करती थीं।
मां ने कान की बाली व अंगूठी बेचकर बेटे को बनाया इंजीनियर
मां अन्नपूर्णा गुप्ता
- फोटो : अमर उजाला
किसी भी मां के लिए अपने लाल से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है। हर मां की ख्वाहिश होती है उसका बेटा खूब पढ़े, खूब बढ़े। इसके लिए मां मेहनत करने से कभी पीछे नहीं रहती है। मां के ठान लेने पर न तो गरीबी आड़े आती है और न ही कोई बाधा ही उसके जज्बे को रोक पाती है।
कस्बा की एक मां गरीबी को झेलते हुए बच्चे को बीटेक कराने के लिए कान की बाली व अंगूठी तक बेच डाली। बेटा आज दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन में सेक्शन इंजीनियर पद पर कार्यरत है। पढ़ाई के दिनो में मिथलेश के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। पिता घुम्मकड़ स्वभाव के थे लिहाजा मां अन्नपूर्णा गुप्ता किसी तरीके से अपने परिवार का पालन पोषण कर रही थी।
मेधावी मिथिलेश ने पालीटेक्निक करने का मन बनाया और मां को यह बात बताई। मां ने उसे गरीबी का एहसास नहीं होने दिया और प्रवेश लेने के लिए हामी भर दी। मां ने अपने कान की बाली व अंगूठी बेचकर मिथिलेश को लखनऊ स्थित हिवेट पालिटेक्निक में प्रवेश दिलाया।
इसके बाद हर महीने का खर्च मां ने अपने मेहनत के बल उठाया और मिथिलेश को बीटेक तक कराया। आखिरकार मां की मेहनत रंग लाई और मिथिलेश दिल्ली मेट्रो कारपोरेशन में सेक्शन इंजीनियर बन गया। मिथिलेश ने बताया कि उसकी सफलता में मां की मेहनत है।
कस्बा की एक मां गरीबी को झेलते हुए बच्चे को बीटेक कराने के लिए कान की बाली व अंगूठी तक बेच डाली। बेटा आज दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन में सेक्शन इंजीनियर पद पर कार्यरत है। पढ़ाई के दिनो में मिथलेश के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। पिता घुम्मकड़ स्वभाव के थे लिहाजा मां अन्नपूर्णा गुप्ता किसी तरीके से अपने परिवार का पालन पोषण कर रही थी।
मेधावी मिथिलेश ने पालीटेक्निक करने का मन बनाया और मां को यह बात बताई। मां ने उसे गरीबी का एहसास नहीं होने दिया और प्रवेश लेने के लिए हामी भर दी। मां ने अपने कान की बाली व अंगूठी बेचकर मिथिलेश को लखनऊ स्थित हिवेट पालिटेक्निक में प्रवेश दिलाया।
इसके बाद हर महीने का खर्च मां ने अपने मेहनत के बल उठाया और मिथिलेश को बीटेक तक कराया। आखिरकार मां की मेहनत रंग लाई और मिथिलेश दिल्ली मेट्रो कारपोरेशन में सेक्शन इंजीनियर बन गया। मिथिलेश ने बताया कि उसकी सफलता में मां की मेहनत है।