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प्रदेशभर में फर्जी डिग्री पर 6000 से ज्यादा कर रहे नौकरी
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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्रों पर नौकरी करने वाले शिक्षकों की संख्या प्रदेश भर में बढ़ने की आशंका है। जांच में छह हजार से अधिक फर्जी प्रमाणपत्र सामने आए हैं। फिलहाल जांच के दायरे में 16 साल की डिग्रियां हैं। 75 जिलों के सत्यापन की प्रक्रिया जल्द पूरी होने की संभावना है। माना जा रहा है कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट अगर पूरी हो गई तो संस्कृत विश्वविद्यालय के कई बड़े नाम और मठाधीश कार्रवाई की जद में आएंगे।
विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी कर रहे शिक्षकों की धड़कने तेज हो गई हैं। फर्जीवाड़े की जांच कर रही एसआईटी के निर्देश पर विश्वविद्यालय प्रमाणपत्रों का सत्यापन करा रहा है। अब तक सत्यापन में सर्वाधिक फर्जी अंकपत्र बलिया, देवरिया, कुशीनगर, आगरा, सिद्धार्थ नगर, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, प्रयागराज, सोनभद्र, बागपत समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों के मिले हैं। परिषदीय विद्यालयों की नियुक्ति में बड़ा घालमेल सामने आने की संभावना है। इसमें पूर्व मध्यमा, उत्तर मध्यमा, शास्त्री और बीएड के फर्जी अंकपत्र व फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर 6000 से अधिक शिक्षक परिषदीय विद्यालयों में नौकरी कर रहे हैं।
संस्कृत विश्वविद्यालय अभी तक 73 जिलों के शिक्षकों के अंकपत्रों व प्रमाणपत्रों का सत्यापन कर चुका है। दो जनपदों के सत्यापन के लिए एसआईटी लगातार दबाव बना रही है। विश्वविद्यालय ने बाकी दो जिलों के प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए काम तेज कर दिया है। हालांकि इस मामले में अभी विश्वविद्यालय व एसआइटी दोनों खुलकर कोई बयान देने से बच रहे हैं।
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जनपद में 315 शिक्षक
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के अंक पत्रों व प्रमाणपत्रों पर जनपद में 315 अध्यापक परिषदीय विद्यालयों में नौकरी कर रहे हैं। बीएसए ने शिक्षकों की सूची एसआईटी को सौंपी थी। इसमें 25 शिक्षकों के अंकपत्र फर्जी होने की आशंका जताई गई थी। शिक्षकों के अंकपत्रों व प्रमाणपत्रों का सत्यापन कर विवि एसआईटी को रिपोर्ट सौंप चुका है।
16 सालों का विवरण किया तलब
16 वर्षों का विवरण तलब कर एसआईटी ने 1998 से 2014 के बीच संस्कृत विश्वविद्यालय की डिग्री पर शिक्षक बने अभ्यर्थियों का ब्योरा बेसिक शिक्षा विभाग से तलब किया था। चयनित शिक्षकों के सभी विवरण सहित तत्कालीन बीएसए का भी नाम मांगा गया है।
पूछा क्या है प्रमाणपत्रों के सत्यापन का तरीका
एसआईटी का कहना है कि उसने विश्वविद्यालय से पूछा है कि प्रमाणपत्रों के सत्यापन का तरीका क्या है। कौन-कौन कर्मचारी सत्यापन करते थे। किन अभिलेखों के आधार पर सत्यापन होता था। एसआईटी टीम के सदस्यों का कहना है कि मामले की तह तक जाने के लिए कर्मचारियों से पूछताछ जरूरी है। इस मामले में अभी तक विश्वविद्यालय के 13 कर्मचारियों से पूछताछ हो चुकी है। प्रदेश के 75 जिलों में संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक पद पर बड़ी संख्या में लोगों ने नियुक्तियां पाई हैं।
2016 में मिली थी गड़बड़ी
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी करने का मामला कई बार सामने आ चुका है। चार साल पहले शुरू हुई जांच में एसआईटी ने 2016 में अपनी जांच में पाया कि विश्वविद्यालय का फर्जी अंक पत्र 3000 से भी ज्यादा लोगों को बेचा गया है। उसी समय एसआईटी ने प्रदेश के सभी बीएसए को पत्र भेजकर डिग्रियों की जांच करने के लिए कहा था और सत्यापन की रिपोर्ट मांगी थी।
विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही से हो रही देरी
अब तक छह बार से ज्यादा एसआईटी विश्वविद्यालय में आ चुकी है, लेकिन जांच पूरी नहीं हो पाई है। विवि पर सत्यापन रिपोर्ट में व्यापक पैमाने पर अनियमितता बरतने का आरोप है। एक बार वैध तो दूसरी बार उसी परीक्षार्थी को फर्जी बताया गया। इसे देखते हुए शासन ने इसकी जांच एसआईटी को सौंप दी। विश्वविद्यालय पिछले दो सालों में 65 में से 50 जिलों के प्रमाणपत्रों का ही सत्यापन करा पाया है। करीब 4000 अंकपत्रों के सत्यापन में लगभग 400 अध्यापकों के अंकपत्र जाली मिले थे।
इन डिग्रियों की हो रही जांच
एसआईटी द्वारा की जा रही जांच में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से जारी पूर्व मध्यमा, उच्चतर मध्यमा, शास्त्री तथा बीएड के समकक्ष शिक्षाशास्त्री की डिग्री शामिल हैं।
कमेटी पर कमेटी बनती रही, लेकिन जांच अधूरी रही
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रमाणपत्रों के फर्जीवाड़े में जांच के तीन-तीन कमेटियां गठित हुईं, लेकिन उनकी प्रगति सिर्फ बैठकों तक ही सिमट कर रह गई। एसआईटी को भी इस कमेटी ने कोई ठोस जानकारी या सूचना उपलब्ध नहीं कराई। विश्वविद्यालय में फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले में जांच और प्रमाणपत्रों के सत्यापन रिपोर्ट तैयार करने के लिए 2016, 2017 और 2018 में कमेटी बनाई गई।
एसआईटी की जांच और प्रमाणपत्रों के सत्यापन में पूरा सहयोग किया जा रहा है। सत्यापन के कार्य के लिए कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ाई गई है।-राजबहादुर,कुलसचिव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
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विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी कर रहे शिक्षकों की धड़कने तेज हो गई हैं। फर्जीवाड़े की जांच कर रही एसआईटी के निर्देश पर विश्वविद्यालय प्रमाणपत्रों का सत्यापन करा रहा है। अब तक सत्यापन में सर्वाधिक फर्जी अंकपत्र बलिया, देवरिया, कुशीनगर, आगरा, सिद्धार्थ नगर, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, प्रयागराज, सोनभद्र, बागपत समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों के मिले हैं। परिषदीय विद्यालयों की नियुक्ति में बड़ा घालमेल सामने आने की संभावना है। इसमें पूर्व मध्यमा, उत्तर मध्यमा, शास्त्री और बीएड के फर्जी अंकपत्र व फर्जी प्रमाणपत्र लगाकर 6000 से अधिक शिक्षक परिषदीय विद्यालयों में नौकरी कर रहे हैं।
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संस्कृत विश्वविद्यालय अभी तक 73 जिलों के शिक्षकों के अंकपत्रों व प्रमाणपत्रों का सत्यापन कर चुका है। दो जनपदों के सत्यापन के लिए एसआईटी लगातार दबाव बना रही है। विश्वविद्यालय ने बाकी दो जिलों के प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए काम तेज कर दिया है। हालांकि इस मामले में अभी विश्वविद्यालय व एसआइटी दोनों खुलकर कोई बयान देने से बच रहे हैं।
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जनपद में 315 शिक्षक
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के अंक पत्रों व प्रमाणपत्रों पर जनपद में 315 अध्यापक परिषदीय विद्यालयों में नौकरी कर रहे हैं। बीएसए ने शिक्षकों की सूची एसआईटी को सौंपी थी। इसमें 25 शिक्षकों के अंकपत्र फर्जी होने की आशंका जताई गई थी। शिक्षकों के अंकपत्रों व प्रमाणपत्रों का सत्यापन कर विवि एसआईटी को रिपोर्ट सौंप चुका है।
16 सालों का विवरण किया तलब
16 वर्षों का विवरण तलब कर एसआईटी ने 1998 से 2014 के बीच संस्कृत विश्वविद्यालय की डिग्री पर शिक्षक बने अभ्यर्थियों का ब्योरा बेसिक शिक्षा विभाग से तलब किया था। चयनित शिक्षकों के सभी विवरण सहित तत्कालीन बीएसए का भी नाम मांगा गया है।
पूछा क्या है प्रमाणपत्रों के सत्यापन का तरीका
एसआईटी का कहना है कि उसने विश्वविद्यालय से पूछा है कि प्रमाणपत्रों के सत्यापन का तरीका क्या है। कौन-कौन कर्मचारी सत्यापन करते थे। किन अभिलेखों के आधार पर सत्यापन होता था। एसआईटी टीम के सदस्यों का कहना है कि मामले की तह तक जाने के लिए कर्मचारियों से पूछताछ जरूरी है। इस मामले में अभी तक विश्वविद्यालय के 13 कर्मचारियों से पूछताछ हो चुकी है। प्रदेश के 75 जिलों में संदिग्ध प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक पद पर बड़ी संख्या में लोगों ने नियुक्तियां पाई हैं।
2016 में मिली थी गड़बड़ी
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी करने का मामला कई बार सामने आ चुका है। चार साल पहले शुरू हुई जांच में एसआईटी ने 2016 में अपनी जांच में पाया कि विश्वविद्यालय का फर्जी अंक पत्र 3000 से भी ज्यादा लोगों को बेचा गया है। उसी समय एसआईटी ने प्रदेश के सभी बीएसए को पत्र भेजकर डिग्रियों की जांच करने के लिए कहा था और सत्यापन की रिपोर्ट मांगी थी।
विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही से हो रही देरी
अब तक छह बार से ज्यादा एसआईटी विश्वविद्यालय में आ चुकी है, लेकिन जांच पूरी नहीं हो पाई है। विवि पर सत्यापन रिपोर्ट में व्यापक पैमाने पर अनियमितता बरतने का आरोप है। एक बार वैध तो दूसरी बार उसी परीक्षार्थी को फर्जी बताया गया। इसे देखते हुए शासन ने इसकी जांच एसआईटी को सौंप दी। विश्वविद्यालय पिछले दो सालों में 65 में से 50 जिलों के प्रमाणपत्रों का ही सत्यापन करा पाया है। करीब 4000 अंकपत्रों के सत्यापन में लगभग 400 अध्यापकों के अंकपत्र जाली मिले थे।
इन डिग्रियों की हो रही जांच
एसआईटी द्वारा की जा रही जांच में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से जारी पूर्व मध्यमा, उच्चतर मध्यमा, शास्त्री तथा बीएड के समकक्ष शिक्षाशास्त्री की डिग्री शामिल हैं।
कमेटी पर कमेटी बनती रही, लेकिन जांच अधूरी रही
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रमाणपत्रों के फर्जीवाड़े में जांच के तीन-तीन कमेटियां गठित हुईं, लेकिन उनकी प्रगति सिर्फ बैठकों तक ही सिमट कर रह गई। एसआईटी को भी इस कमेटी ने कोई ठोस जानकारी या सूचना उपलब्ध नहीं कराई। विश्वविद्यालय में फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले में जांच और प्रमाणपत्रों के सत्यापन रिपोर्ट तैयार करने के लिए 2016, 2017 और 2018 में कमेटी बनाई गई।
एसआईटी की जांच और प्रमाणपत्रों के सत्यापन में पूरा सहयोग किया जा रहा है। सत्यापन के कार्य के लिए कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ाई गई है।-राजबहादुर,कुलसचिव, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय