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UP: परीक्षा का दबाव बढ़ा रहा किशोरों में तनाव, रोजाना 60 से ज्यादा छात्र ले रहे मानसिक स्वास्थ्य का परामर्श

Sat, 03 Jan 2026 04:35 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Sat, 03 Jan 2026 04:35 PM IST
सार

Varanasi News: पढ़ाई और परीक्षा के दबाव के कारण किशोरों में तनाव की समस्या बढ़ रही है। ऐसे में वाराणसी में मानसिक अस्पताल की ओपीडी में  रोजाना 60 से ज्यादा छात्र मानसिक स्वास्थ्य का परामर्श ले रहे हैं। 

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more than 60 student seeking mental health counseling daily due to stress caused by exam pressure in varanasi
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : फ्री पिक

विस्तार

परीक्षाएं नजदीक आते ही 12 से 17 साल की उम्र के बच्चों और किशोरों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ता जा रहा है। यही दबाव अब मानसिक तनाव और अवसाद का कारण बनकर सामने आ रहा है। मानसिक अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीज और टेलीमानस सेवा में आने वाले फोन कॉल को मिलाकर रोज करीब 60 से अधिक किशोर मानसिक स्वास्थ्य परामर्श ले रहे हैं। 

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मानसिक अस्पताल की ओपीडी में रोजाना करीब 30 छात्र आ रहे हैं। वहीं, टेलीमानस पर भी इतने ही फोन कॉल आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े सिर्फ दर्ज मामलों को दर्शाते हैं, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।
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टेलीमानस के पर्सनल सपोर्ट वर्कर (पीएसडब्ल्यू) पंकज यादव बताते हैं कि छात्रों में आमतौर पर बिना बात उदास रहने, चिड़चिड़ापन बढ़ने, नींद कम होने, पढ़ाई में ध्यान न लगने जैसे लक्षण ज्यादा देखे जा रहे हैं। कई मामलों में बच्चों ने परीक्षा के डर की वजह से खाना-पीना भी कम कर दिया है। कक्षा 9 से 12 तक के ज्यादातर विद्यार्थी इस तनाव का शिकार बन रहे हैं।

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केस - 1
10वीं की पढ़ाई कर रहे 15 वर्षीय आरव (बदला हुआ नाम) के माता-पिता चाहते थे कि वह विज्ञान वर्ग चुने और 90 प्रतिशत से ऊपर अंक लाए। लगातार स्कूल और कोचिंग के बीच वह दिनभर व्यस्त रहता था। नतीजा ये हुआ कि रात में उसकी कई बार नींद टूटने लगी। नींद में बड़बड़ाने लगा। उसकी भूख भी कम हो गई। टेलीमानस पर परामर्श लेने के बाद परिजन उसे काउंसलिंग के लिए मानसिक अस्पताल लेकर गए। 15 दिन तक उसकी काउंसलिंग हुई और काफी हद तक सुधार दिखा।
 
केस – 2
शिवपुर की 13 वर्षीय कक्षा आठ की छात्रा स्नेहा (बदला हुआ नाम) हर विषय में टॉप करती थी, लेकिन अचानक परीक्षाओं में नंबर कम आने लगे। परिवार और स्कूल दोनों जगह से अपेक्षाओं ने दबाव बढ़ा दिया। स्नेहा कुछ भी गलत हो जाने पर खुद को दोष देती थी। वह हर समय उदास रहने लगी और आत्मविश्वास में कमी आने लगी। अस्पताल की ओपीडी में चिकित्सकों ने परिवार से बातचीत की, पढ़ाई की दिनचर्या हल्की करने की सलाह दी और नियमित काउंसलिंग शुरू की।

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केस – 3
11वीं के 16 वर्षीय छात्र रियान (बदला हुआ नाम) विज्ञान वर्ग से पढ़ाई कर रहा था। लेकिन, गणित में वो थोड़ा कमजोर था। कोचिंग में शिक्षक की फटकार और सहपाठियों की तुलना ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया। रियान को कई बार बिना वजह गुस्सा आने लगा और चिड़चिड़ापन बढ़ गया। परिवार को व्यवहार में बदलाव दिखा तो उन्होंने टेलीमानस से संपर्क किया। काउंसलर ने एंजाइटी कंट्रोल की दवा और जीवनशैली में बदलाव सुझाए।

कई बच्चों ने तनाव में कम कर दिया खाना-पीना

टेलीमानस के पर्सनल सपोर्ट वर्कर (पीएसडब्ल्यू) पंकज यादव बताते हैं कि छात्रों में आमतौर पर बड़बड़ाने, बिना बात उदास रहने, चिड़चिड़ापन बढ़ने, नींद कम होने, पढ़ाई में ध्यान न लगने और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने जैसे लक्षण ज्यादा देखे जा रहे हैं। कई मामलों में बच्चों ने परीक्षा के डर की वजह से खाना-पीना भी कम कर दिया है। परिजनों के दबाव, कोचिंग का बोझ, बेहतर नंबर लाने की होड़ और असफलता के डर ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। कक्षा 9 से 12 तक के ज्यादातर विद्यार्थी इस तनाव का शिकार बन रहे हैं।
 

क्या बोले चिकित्सक
बच्चों को समय रहते परामर्श मिल जाए तो बच्चों को दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ सकारात्मक माहौल और नियमित काउंसलिंग ही काफी होती है। अभिभावक अपने बच्चों के साथ बातचीत करें। उनके डर और असमंजस को समझें और अपेक्षाओं का बोझ न डालें। बच्चों को पर्याप्त नींद, हल्का व्यायाम और मनोरंजन का भी समय देना जरूरी है। शिक्षकों को भी बच्चों से शालीनतापूर्वक पेश आना चाहिए। -डॉ. चंद्रप्रकाश मल्ल, निदेशक, मानसिक अस्पताल 

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