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महामूर्ख मेला: 56वीं बार होगी बेमेल शादी, गूंजेगा चीपो-चीपो गंदर्भ राग, धोबिया डांस देखने को होता है जुटान

Sat, 30 Mar 2024 01:08 PM IST
अमन विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 30 Mar 2024 01:08 PM IST
सार

Varanasi News: कार्यक्रम में धोबिया नृत्य के अलावा बेमेल शादी, नगाड़े की थाप पर डांस और गर्दभ की चीपो-चीपो सुनने के लिए लोग जुटेंगे। महामूर्ख मेले के संयोजक कवि पं. सुदामा तिवारी सांड़ बनारसी ने बताया कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद हास्य व्यंग्य व पहली अप्रैल को कोई सार्वजनिक उत्सव नहीं होता था।

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Mismatched marriage will take place for 56 time varanasi ganga ghat in mahamurkh Sammelan
महामूर्ख मेला। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सात वार नौ त्योहार की नगरी काशी में त्योहारों और मेलों की लंबी शृंखला है। इन्हीं मेलों में अनोखा मेला है महामूर्ख मेला। हर साल पहली अप्रैल को काशी की जनता महामूर्ख बनने के लिए इस मेले में जुटती है। साढ़े पांच दशकों से महामूर्ख मेला सजता आ रहा है। धोबिया नृत्य और गर्दभ ध्वनि सुनने के लिए गंगा के मुक्ताकाशीय मंच पर जनता की जुटान होती है।

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पहली अप्रैल को 56वें महामूर्ख मेले में डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट की सीढि़यों पर हजारों श्रोता सिर्फ ठहाका लगाने और महामूर्ख बनने के लिए एकत्र होंगे। कार्यक्रम में धोबिया नृत्य के अलावा बेमेल शादी, नगाड़े की थाप पर डांस और गर्दभ की चीपो-चीपो सुनने के लिए लोग जुटेंगे। महामूर्ख मेले के संयोजक कवि पं. सुदामा तिवारी सांड़ बनारसी ने बताया कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद हास्य व्यंग्य व पहली अप्रैल को कोई सार्वजनिक उत्सव नहीं होता था। शनिवार गोष्ठी ने हास्य व्यंग्य के मेले की शुरूआत की।
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महामूर्ख मेले की शुरुआत 1969 में दशाश्वमेध घाट पर बजड़े पर हुई। इसमें यूपी के राज्यपाल सर होमी मोदी के पुत्र सांसद पीलू मोदी दूल्हा व काशी के रईस महेंद्र शाह को दुल्हन बनाया गया था। अब तक महामूर्ख सम्मेलन में कई मंत्री, सांसद, विधायक, चिकित्सक दूल्हा-दुल्हन बन चुके हैं। महामूर्ख मेले के पहले संयोजक पं. धर्मशील चतुर्वेदी थे। उनके निधन के बाद सांड़ बनारसी व दमदार बनारसी इसका संयोजन कर रहे हैं।
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पांच बार बदली जगह, नहीं बदला कलेवर
संयोजक दमदार बनारसी का कहना है कि 56 सालों में महामूर्ख मेले की जगह बदली लेकिन कलेवर में कोई बदलाव नहीं आया। बिना किसी निमंत्रण के काशी की जनता का समुदाय डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट के मुक्ताकाशीय मंच पर एकत्र होता है। 1971 में महामूर्ख मेला दशाश्वमेध घाट से भद्दोमल की कोठी में किया गया। इसमें लोगों की भीड़ कम होती थी। दस साल तक आयोजन के बाद दो साल तक चौक थाना परिसर में इसका आयोजन हुआ। 


इसके बाद 1983 से 1985 तक नागरी नाटक मंडली में इसका आयोजन हुआ। 1986 में इसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट पर लाया गया और 37 सालों से आज तक अनवरत इसका आयोजन हो रहा है। इसमें आयोजन में माधव प्रसाद मिश्र, भइया जी बनारसी, लक्ष्मीशंकर व्यास, बेढब बनारसी, चकाचक बनारसी समेत कई कवियों ने प्रस्तुतियां दी हैं।

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