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सिख दंगा: 34 साल बाद भी नहीं मिटी बनारस में हुई आगजनी की कालिख
Tue, 18 Dec 2018 04:03 PM IST
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न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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Published by: utpal utpal
Updated Tue, 18 Dec 2018 04:03 PM IST
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31 अक्टूबर 1984 को बनारस में हुई आगजनी की कालिख अभी तक दीवारों से नहीं मिटी है। पुलिस किसी गुनहगार को 34 साल एक माह और 16 दिन बाद भी चिह्नित नहीं कर सकी। कोर्ट द्वारा सिख दंगे में आरोपी कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दोषी ठहराया तो वाराणसी में दर्द भरी दास्तां याद कर आगजनी में मारे गए काशीनाथ गुजराल के बेटे सत्येंद्र की आंखें भर आईं।
कोर्ट का फैसला आने के बाद सत्येंद्र ने बताया कि आजादी के बाद 1950 में पंजाब से आकर काशीनाथ गुजराल अपने छोटे भाई जोगेंद्र के साथ लंका में सरदार स्टोर्स के नाम से मेडिकल स्टोर और उनके भाई सरदार प्रॉविजन स्टोर्स नाम से दुकान चलाने लगे। दुकान के पीछे बने मकान में ही परिवार रहता था। काशीनाथ गुजराल बैंक में नौकरी करते थे। 31 अक्टूबर 1984 को दंगाइयों ने दुकान-मकान को आग लगा दी।
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कोर्ट का फैसला आने के बाद सत्येंद्र ने बताया कि आजादी के बाद 1950 में पंजाब से आकर काशीनाथ गुजराल अपने छोटे भाई जोगेंद्र के साथ लंका में सरदार स्टोर्स के नाम से मेडिकल स्टोर और उनके भाई सरदार प्रॉविजन स्टोर्स नाम से दुकान चलाने लगे। दुकान के पीछे बने मकान में ही परिवार रहता था। काशीनाथ गुजराल बैंक में नौकरी करते थे। 31 अक्टूबर 1984 को दंगाइयों ने दुकान-मकान को आग लगा दी।
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परिवार के लोग किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन काशीनाथ गंभीर रूप से झुलस गए थे। बीएचयू में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी। परिवार के लोग इतने सहम गए कि घर में कोई कभी देखने नहीं पहुंचा। इसके बाद परिवार माधव मार्केट में रहने लगा।
यहां भी घर में उपद्रवियों ने आग लगा दी तो परिवार पलायन कर गया। सत्येंद्र के मुताबिक, वह पूरे परिवार के साथ इस घर को त्यागकर कबीर नगर में परिवार के साथ रहने लगे। डर की वजह से दुकान का नाम बदलकर सत्येंद्र और काशीनाथ प्रोविजन स्टोर्स रखा गया है।
यहां भी घर में उपद्रवियों ने आग लगा दी तो परिवार पलायन कर गया। सत्येंद्र के मुताबिक, वह पूरे परिवार के साथ इस घर को त्यागकर कबीर नगर में परिवार के साथ रहने लगे। डर की वजह से दुकान का नाम बदलकर सत्येंद्र और काशीनाथ प्रोविजन स्टोर्स रखा गया है।