{"_id":"5702d4fe4f1c1b205ec814b5","slug":"mars-will-become-a-world-heritage-burhava","type":"story","status":"publish","title_hn":"विश्व धरोहर बनेगा बुढ़वा मंगल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विश्व धरोहर बनेगा बुढ़वा मंगल
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 05 Apr 2016 02:26 AM IST
विज्ञापन
गंगा की लहरों पर सजी बुढ़वा मंगल की महफिल (फाइल फोटो)।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संगीत के शहर बनारस में गंगा की मध्यधारा पर बजड़ों (दो मंजिला बड़ी नावों), पटैलों और छोटी नावों के झूमरों पर लगने वाली अनूठी संगीत महफिल को विश्व धरोहर के रूप में पहचान दिलाने की तैयारियां कर ली गई हैं। ‘बुढ़वा मंगल’ के रूप में करीब 287 साल पुराने जलोत्सव की परंपरा को यादगार निशानी के तौर पर संजोया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां इससे परिचित होती रहें। सूबे के संस्कृति विभाग ने इसके लिए संगीत नाटक अकादमी से संपर्क साधा है, ताकि यूनेस्को में नामांकन कराया जा सके। काशी में फागुन के आखिरी मंगल को लगने वाली ‘बुढ़वा मंगल’ की यह देश की इकलौती संगीत महफिल है। इसे काशीवासी वृद्ध अंगारक पर्व के रूप में मनाते हैं।
उत्सवों की नगरी काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की शुरुआत 1729 में यहां के सूबेदार मीर रुस्तम अली ने की थी। तब काशी नरेश से लेकर आसपास की राज-रियासतों के रजवाड़ों की मोरपंखियों, परियों, हंसों के जोड़ों वाली नावों, शाही बजड़ों के समूहों पर नृत्य-संगीत की महफिलें सजती थीं। उन्हीं नाव-बजड़ों से काशी के रईसों के भी सुसज्जित बजड़े जोड़े जाते थे। गंगा के जलमार्ग पर खाने-पीने की वस्तुओं के साथ मेला लग जाता था। मेहताबी रोशनी में कहीं नृत्य, कहीं गायन तो कहीं साज बजते थे और संगीत रसिकों के समूह उस रस का आनंद उठाते थे। तब यह महफिल रात भर चलती थी। अब सूबे का संस्कृति विभाग इस परंपरा को थामे हुए है।
क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा बताते हैं कि बुढ़वा मंगल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए दस्तावेजीकरण करा लिया गया है। बीते वर्ष ही इसका प्रस्ताव यूनेस्को को भेजा जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। संगीत नाटक अकादमी की संस्कृति विभाग की सदस्य सचिव उषा आरके ने इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू की है। केंद्र से संपर्क साधा गया है। हफ्ते भर के भीतर बुढ़वा मंगल के नामांकन के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
उत्सवों की नगरी काशी में ‘बुढ़वा मंगल’ की शुरुआत 1729 में यहां के सूबेदार मीर रुस्तम अली ने की थी। तब काशी नरेश से लेकर आसपास की राज-रियासतों के रजवाड़ों की मोरपंखियों, परियों, हंसों के जोड़ों वाली नावों, शाही बजड़ों के समूहों पर नृत्य-संगीत की महफिलें सजती थीं। उन्हीं नाव-बजड़ों से काशी के रईसों के भी सुसज्जित बजड़े जोड़े जाते थे। गंगा के जलमार्ग पर खाने-पीने की वस्तुओं के साथ मेला लग जाता था। मेहताबी रोशनी में कहीं नृत्य, कहीं गायन तो कहीं साज बजते थे और संगीत रसिकों के समूह उस रस का आनंद उठाते थे। तब यह महफिल रात भर चलती थी। अब सूबे का संस्कृति विभाग इस परंपरा को थामे हुए है।
विज्ञापन
क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा बताते हैं कि बुढ़वा मंगल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए दस्तावेजीकरण करा लिया गया है। बीते वर्ष ही इसका प्रस्ताव यूनेस्को को भेजा जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। संगीत नाटक अकादमी की संस्कृति विभाग की सदस्य सचिव उषा आरके ने इसमें दिलचस्पी लेनी शुरू की है। केंद्र से संपर्क साधा गया है। हफ्ते भर के भीतर बुढ़वा मंगल के नामांकन के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा।
विज्ञापन