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मलाला दिवसः काशी की इन बेटियों ने नहीं मानी हार, चुनौतियां दरकिनार कर बन रहीं दूसरों का सहारा
पूजा सिंह, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 12 Jul 2018 05:44 PM IST
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बेटियां हमारी, हार नहीं मानी, हिम्मत नहीं हारी
- फोटो : अमर उजाला
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हर बच्चा, हर किशोर, हर युवा...राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण है चाहे, वह लड़का हो या लड़की। पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई ने शिक्षा की खातिर जीवन की परवाह नहीं की। बालिका शिक्षा का रोल मॉडल बन चुकी मलाला पूरी दुनिया के लिए एक चेहरा हैं।
लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज उठाने के कारण तालिबान की गोलियों की शिकार बनी मलाला युसुफजई का जन्मदिन 12 जुलाई पाकिस्तान और पूरी दुनिया में मलाला दिवस के रूप में मनाया जाता है।
बनारस शहर में भी ऐसी बेटियां, जिन्होंने आर्थिक तंगी और पारिवारिक हालात को दरकिनार कर शिक्षा की तरफ कदम बढ़ाया और मिसाल बन गईं। अब इन्हीं बेटियों द्वारा दूसरे बच्चों का भविष्य संवारने के जुनून के बारे में बता रही हैं पूजा सिंह। आगे की स्लाइड्स में देखें..
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लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज उठाने के कारण तालिबान की गोलियों की शिकार बनी मलाला युसुफजई का जन्मदिन 12 जुलाई पाकिस्तान और पूरी दुनिया में मलाला दिवस के रूप में मनाया जाता है।
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बनारस शहर में भी ऐसी बेटियां, जिन्होंने आर्थिक तंगी और पारिवारिक हालात को दरकिनार कर शिक्षा की तरफ कदम बढ़ाया और मिसाल बन गईं। अब इन्हीं बेटियों द्वारा दूसरे बच्चों का भविष्य संवारने के जुनून के बारे में बता रही हैं पूजा सिंह। आगे की स्लाइड्स में देखें..
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बहुत मुश्किल थी शिक्षा की डगर
काजल
- फोटो : अमर उजाला
खोजवां निवासी काजल काशी विद्यापीठ से एमफिल कर रहीं हैं। बचपन में काजल पढ़ना चाहती थीं लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण पापा ने कक्षा छह में स्कूल भेजने से मना कर दिया। मां ने घरों में काम कर फीस का इंतजाम किया।
12वीं पास करने के बाद फिजियोथेरेपी क्लीनिक में काम करने लगी। उसी साल बीएचयू में प्रवेश मिल गया। नौकरी के साथ-साथ स्नातक पूरा किया। परास्नातक में प्रवेश के बाद साक्षर इंडिया फाउंडेशन के साथ जुड़कर बच्चों को पढ़ाने लगीं।
आईएएस की कोचिंग में पढ़ाने के दौरान संस्थापक सुनील मिश्रा ने नेट के लिए प्रेरित किया। 2017 में नेट पास काजल अब जेआरएफ के लिए प्रयासरत हैं।
12वीं पास करने के बाद फिजियोथेरेपी क्लीनिक में काम करने लगी। उसी साल बीएचयू में प्रवेश मिल गया। नौकरी के साथ-साथ स्नातक पूरा किया। परास्नातक में प्रवेश के बाद साक्षर इंडिया फाउंडेशन के साथ जुड़कर बच्चों को पढ़ाने लगीं।
आईएएस की कोचिंग में पढ़ाने के दौरान संस्थापक सुनील मिश्रा ने नेट के लिए प्रेरित किया। 2017 में नेट पास काजल अब जेआरएफ के लिए प्रयासरत हैं।
टूयूशन पढ़ाकर भरी अपनी ट्यूशन फीस
श्रद्घा मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला
कमच्छा स्थित जीवद्दीपुर निवासी श्रद्घा मिश्रा के पिता की मानसिक हालत ठीक नहीं थी। मां घर में सिलाई का काम करती थीं। मां के सिलाई के काम से जो आमदनी होती, उससे ही हम दोनों भाई-बहन पढ़ने जाते थे।
घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण 10वीं कक्षा में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी फीस भरी। सही मार्गदर्शन न मिलने से आगे पढ़ाई की उम्मीद भी नहीं बची थी। बावजूद इसके हार नहीं मानी।
तमाम चुनौतियों का सामना किया। खुद रास्ता बनाया। स्नातक करते हुए पार्टटाइम नौकरी के लिए कंप्यूटर इंस्टीट्यूट के साथ मां के सिलाई के काम में हाथ बंटाया। श्रद्घा कहती हैं, आज मैं गरीब बच्चों को शिक्षा देती हूं तो खुद को बहुत अच्छा लगता है।
घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण 10वीं कक्षा में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी फीस भरी। सही मार्गदर्शन न मिलने से आगे पढ़ाई की उम्मीद भी नहीं बची थी। बावजूद इसके हार नहीं मानी।
तमाम चुनौतियों का सामना किया। खुद रास्ता बनाया। स्नातक करते हुए पार्टटाइम नौकरी के लिए कंप्यूटर इंस्टीट्यूट के साथ मां के सिलाई के काम में हाथ बंटाया। श्रद्घा कहती हैं, आज मैं गरीब बच्चों को शिक्षा देती हूं तो खुद को बहुत अच्छा लगता है।
इस शहर ने सहारा दिया, अब मेरी बारी
नेहा दूबे
- फोटो : अमर उजाला
बिहार निवासी नेहा दूबे के गांव में स्कूल नहीं था, इसलिए नौवीं कक्षा में बनारस आ गईं। 10वीं पास करने के बाद टेलीकॉलिंग कंपनी में काम करने लगी। स्नातक में प्रवेश लिया तो घर से सहयोग नहीं मिला। अकेले ही बनारस में रहकर काम के साथ पढ़ाई पूरी की।
पढ़ाई के फीस के लिए दोस्तों से पैसे लेती और थोड़ा-थोड़ा कर उन्हें वापस करती। पढ़ाई के बाद केयर इंडिया में नौकरी लगी पर लगा जिस शहर ने मुझे सहारा दिया, मैं उसके लिए ही काम करूं यह सोच कर माय होम इंडिया से जुड़ गई।
पढ़ाई के फीस के लिए दोस्तों से पैसे लेती और थोड़ा-थोड़ा कर उन्हें वापस करती। पढ़ाई के बाद केयर इंडिया में नौकरी लगी पर लगा जिस शहर ने मुझे सहारा दिया, मैं उसके लिए ही काम करूं यह सोच कर माय होम इंडिया से जुड़ गई।
यहां से जो पैसे मिलते है, उससे झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को बुुनियादी शिक्षा के साथ सप्ताह में एक दिन फाइन आर्ट्स, थिएटर, पेंटिंग की भी जानकारी देती हूं।
अपनी धुन से हासिल किए 72 फीसदी अंक
कृष्णावती
- फोटो : अमर उजाला
गरीब परिवार में पली कृष्णावती ने 10वीं कक्षा की परीक्षा 72 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। पिता गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं। घर की स्थिति ऐसी नहीं कि जो चाहें वो मिल जाए। कभी-कभी ऐसा होता है किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे।
इस समय 11वीं की छात्रा कृष्णावती स्कूल से आने के बाद साक्षर इंडिया फाउंडेशन के बुक बैंक में पढ़ाई करती है। यहां से घर आकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं। कृष्णावाती की इच्छा पढ़ाई करके अच्छी सरकारी नौकरी की है।
कहती है- बचपन से देखती आ रही हूं कि गरीबी के कारण कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। नौकरी मिलने घर-परिवार के साथ समाज को दिशा देने में समर्थ हो सकूंगी।
इस समय 11वीं की छात्रा कृष्णावती स्कूल से आने के बाद साक्षर इंडिया फाउंडेशन के बुक बैंक में पढ़ाई करती है। यहां से घर आकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं। कृष्णावाती की इच्छा पढ़ाई करके अच्छी सरकारी नौकरी की है।
कहती है- बचपन से देखती आ रही हूं कि गरीबी के कारण कितने कष्ट उठाने पड़ते हैं। नौकरी मिलने घर-परिवार के साथ समाज को दिशा देने में समर्थ हो सकूंगी।