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महानिशा काल में जागृत हुईं गुप्त विद्याएं
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वाराणसी। लोहबान की गंध में मंत्र सिद्ध होते रहे और तंत्र विद्या परवान चढ़ती रही। तंत्र साधना में विघभन न पड़े इसके लिए एकांत और निर्जन स्थानों की तलाश में साधक जुटे रहे। रविवार को कालरात्रि में रातभर जागकर अपने इष्टदेव की पूजा की परंपरा का निर्वहन करते हुए साधकों ने महानिशा काल में विशेष आराधना की। दीपावली की रात कालरात्रि की तरह-तरह से पूजा की गई। महानिशा में गुप्त विद्याओं को जगाया गया। काशी के महाश्मशान में इन विद्याओं को इस तरीके से जगाया गया, जिससे कोई रोकटोक न हो।
रविवार को महानिशा काल में साधकों ने गुप्त विद्याओं और मंत्र सिद्धि के लिए एकांत और निर्जन स्थान की तलाश में घाटों के उस पार भटकते नजर आए। दीपावली की मध्यरात्रि में कुछ साधकों ने बलि भी दी। कुछ ने सात्विक ओर कुछ ने तामसी बलि दी। सात्विक बलि में नींबू, कोहड़ा, नारियल की बलि देकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया जबकि तामसी बलि में मुर्गा, बकरा, शराब, उल्लू आदि की बलि चढ़ाकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया। बलि चढ़ाने के दौरान रोकटोक से बचने के लिए कई जतन किए गए।
मान्यता है कि पूजा अवधि के दौरान यदि कोई टोक करे तो पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। मंत्र और तंत्र विद्या के बल पर पूजाकाल में साधना सफल होने से वर्ष भर साधक का बल बना रहता है। तंत्र मंत्र का सामान बेचने वाले दुकानदारों की मानें तो महानिशा की रात में उल्लू की हड्डी से भी साधना की जाती है। कुछ लोग दीपावली वाले दिन उल्लू खरीदते हैं। बाजार में हड्डी कुछ खास दुकानों पर ही मिलता है। साधक उल्लू की हड्डी की तलाश में भटकते रहे। तांत्रिकों की मानें तो दीपावली की पूजा लक्ष्मी गणेश की समर्पित है। देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू है इस नाते पूजा में उल्लू का विशेष महत्व होता है।
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रविवार को महानिशा काल में साधकों ने गुप्त विद्याओं और मंत्र सिद्धि के लिए एकांत और निर्जन स्थान की तलाश में घाटों के उस पार भटकते नजर आए। दीपावली की मध्यरात्रि में कुछ साधकों ने बलि भी दी। कुछ ने सात्विक ओर कुछ ने तामसी बलि दी। सात्विक बलि में नींबू, कोहड़ा, नारियल की बलि देकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया जबकि तामसी बलि में मुर्गा, बकरा, शराब, उल्लू आदि की बलि चढ़ाकर इष्टदेव को प्रसन्न किया गया। बलि चढ़ाने के दौरान रोकटोक से बचने के लिए कई जतन किए गए।
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मान्यता है कि पूजा अवधि के दौरान यदि कोई टोक करे तो पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। मंत्र और तंत्र विद्या के बल पर पूजाकाल में साधना सफल होने से वर्ष भर साधक का बल बना रहता है। तंत्र मंत्र का सामान बेचने वाले दुकानदारों की मानें तो महानिशा की रात में उल्लू की हड्डी से भी साधना की जाती है। कुछ लोग दीपावली वाले दिन उल्लू खरीदते हैं। बाजार में हड्डी कुछ खास दुकानों पर ही मिलता है। साधक उल्लू की हड्डी की तलाश में भटकते रहे। तांत्रिकों की मानें तो दीपावली की पूजा लक्ष्मी गणेश की समर्पित है। देवी लक्ष्मी की सवारी उल्लू है इस नाते पूजा में उल्लू का विशेष महत्व होता है।
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