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पैर के साथ रोजगार गंवाया, पिता के साथ खाली हाथ घर आया अखिलेश
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राजातालाब (वाराणसी)। बलिया के रसड़ा का अखिलेश राजभर काम की तलाश में दिल्ली गया। एक फैक्ट्री में काम मिला तो उसे लगा अब दिन संवर जाएंगे, मगर घर लौटने तक उसने बहुत कुछ गंवा दिया।
फैक्ट्री में काम के दौरान हुए हादसे में अखिलेश ने पैर गया दिया। हादसे के बाद फैक्ट्री प्रबंधन ने एक महीने तक तो मदद की, लेकिन बाद में उसे बाहर निकाल दिया। जब रोजगार गया तो उसने घर लौटने की ठानी। उसने पिता अनिल राजभर को दिल्ली बुला लिया। बाप-बेटे घर लौटने की तैयारी कर ही रहे थे कि कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लॉकडाउन हो गया।
इसी बीच बलिया में अखिलेश की दादी का देहांत हो गया। इसकी सूचना मिली तो बाप-बेटे दिल्ली से चल पड़े। पैर दिव्यांग अखिलेश को देख कभी किसी वाहन वाले ने मदद की तो कभी वह पैदल चले। जब वह बनारस के मोहनसराय पहुंचे तो कुछ लोगों की नजर इन दोनों पर पड़ी। उन्होंने दोनों को बलिया भेजा। अखिलेश ने बताया कि हादसे के बाद कंपनी ने इलाज का वादा किया था। लेकिन एक महीने बाद खर्च देने से मना कर दिया। बाद में नौकरी से भी निकाल दिया। कंपनी ने हर्जाने के पैसे भी नहीं दिए।
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पैर में नहीं थे जूते, पॉलीथिन बांधकर चला पैदल
पिता-पुत्र की मदद करने वाले रेड ब्रिगेड ट्रस्ट के अजय पटेल ने बताया कि दिव्यांग के पैर में जूते नहीं थे। वह पॉलिथीन बांधकर आया था। संस्था के लोग खाना बांट रहे थे, तभी उनकी नजर दोनों पर पड़ी। इसके बाद उन्हें जूते दिलाए गए और आर्थिक मदद की गई। साथ ही बलिया रूट की गाड़ी पर बैठाकर उन्हें घर भेजा गया।
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फैक्ट्री में काम के दौरान हुए हादसे में अखिलेश ने पैर गया दिया। हादसे के बाद फैक्ट्री प्रबंधन ने एक महीने तक तो मदद की, लेकिन बाद में उसे बाहर निकाल दिया। जब रोजगार गया तो उसने घर लौटने की ठानी। उसने पिता अनिल राजभर को दिल्ली बुला लिया। बाप-बेटे घर लौटने की तैयारी कर ही रहे थे कि कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण लॉकडाउन हो गया।
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इसी बीच बलिया में अखिलेश की दादी का देहांत हो गया। इसकी सूचना मिली तो बाप-बेटे दिल्ली से चल पड़े। पैर दिव्यांग अखिलेश को देख कभी किसी वाहन वाले ने मदद की तो कभी वह पैदल चले। जब वह बनारस के मोहनसराय पहुंचे तो कुछ लोगों की नजर इन दोनों पर पड़ी। उन्होंने दोनों को बलिया भेजा। अखिलेश ने बताया कि हादसे के बाद कंपनी ने इलाज का वादा किया था। लेकिन एक महीने बाद खर्च देने से मना कर दिया। बाद में नौकरी से भी निकाल दिया। कंपनी ने हर्जाने के पैसे भी नहीं दिए।
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पैर में नहीं थे जूते, पॉलीथिन बांधकर चला पैदल
पिता-पुत्र की मदद करने वाले रेड ब्रिगेड ट्रस्ट के अजय पटेल ने बताया कि दिव्यांग के पैर में जूते नहीं थे। वह पॉलिथीन बांधकर आया था। संस्था के लोग खाना बांट रहे थे, तभी उनकी नजर दोनों पर पड़ी। इसके बाद उन्हें जूते दिलाए गए और आर्थिक मदद की गई। साथ ही बलिया रूट की गाड़ी पर बैठाकर उन्हें घर भेजा गया।